क्या है यौम-ए-आराफ़ा और क्यों मनाते हैं इसे? जानें इस दिन क्यों उमड़ती है करोड़ों की आस्था
यौम-ए-आराफ़ा 2026 को लेकर विस्तृत जानकारी, जो 26 मई 2026 को मनाया जाएगा। हज यात्रा का दूसरा दिन माउंट आराफ़ात पर विशेष प्रार्थना, वुक़ूफ़ अनुष्ठान, पैगंबर मुहम्मद का ऐतिहासिक उपदेश, रोज़े का महत्व और दुआ-ए-आराफ़ा की धार्मिक परंपरा को दर्शाता है।

यौम-ए-आराफ़ा का धार्मिक महत्व
इस्लामिक कैलेंडर के सबसे पवित्र और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण दिनों में से एक यौम-ए-आराफ़ा (Day of Arafah) वर्ष 2026 में मंगलवार, 26 मई 2026 को मनाया जाएगा, जो इस्लामी पंचांग के अनुसार 9 ज़िलहिज्जा 1447 हिजरी के अनुरूप है। यह दिन हज यात्रा का दूसरा चरण माना जाता है और इसके तुरंत बाद ईद-उल-अज़हा का पर्व मनाया जाता है। यह अवसर केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, क्षमा और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
यौम-ए-आराफ़ा के अवसर पर मक्का के निकट स्थित पवित्र स्थल माउंट आराफ़ात और आराफ़ात के विशाल मैदान में लाखों हज यात्री एकत्रित होते हैं। सऊदी अरब में स्थित यह स्थल मक्का से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में एक विशाल समतल क्षेत्र में स्थित है। यहां मौजूद माउंट आराफ़ात एक ग्रेनोडियोराइट पहाड़ी है, जिसकी ऊंचाई लगभग 70 मीटर (230 फीट) है। इसे “जबल अर-रहमा” या “माउंट ऑफ मर्सी” यानी दया का पर्वत भी कहा जाता है।
इस्लामी परंपरा के अनुसार, यही वह ऐतिहासिक स्थल है जहां पैगंबर मुहम्मद ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष में हज के दौरान अपना विदाई उपदेश दिया था। साथ ही, कई मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन कुरान की वह आयत भी प्रकट हुई थी जिसमें इस्लाम धर्म की पूर्णता की घोषणा की गई थी, जिससे इस दिन का धार्मिक महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
हज के दौरान 9 ज़िलहिज्जा की सुबह तीर्थयात्री मिना से प्रस्थान कर आराफ़ात के मैदान की ओर बढ़ते हैं। दोपहर तक वे वहां पहुंचकर ‘वुक़ूफ़’ यानी ईश्वर के समक्ष खड़े रहने की स्थिति में प्रवेश करते हैं। यह हज का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है, जिसमें श्रद्धालु दुआ, तौबा, आत्ममंथन और ईश्वर से क्षमा याचना करते हैं। यह स्थिति दोपहर से सूर्यास्त तक चलती है, जिसे आध्यात्मिक एकाग्रता और आत्म-समर्पण का चरम क्षण माना जाता है।
इस दौरान मस्जिद अल-नमिरा में हज यात्री ज़ुहर और अस्र की नमाज़ एक साथ अदा करते हैं। धार्मिक नियमों के अनुसार, यदि कोई तीर्थयात्री आराफ़ात में यह समय नहीं बिताता, तो उसका हज पूर्ण नहीं माना जाता। यह नियम इस अनुष्ठान के अत्यधिक महत्व को दर्शाता है। शिया मुस्लिम परंपरा में इस दिन को विशेष रूप से ‘दुआ-ए-आराफ़ा’ के रूप में याद किया जाता है, जिसे हुसैन इब्न अली ने माउंट आराफ़ात पर पढ़ा था। हज में शामिल श्रद्धालु ज़ुहर से सूर्यास्त तक इस दुआ का पाठ करते हैं, जबकि जो लोग हज पर नहीं जाते, वे मस्जिदों और पवित्र स्थलों पर इस प्रार्थना का पालन करते हैं।
इसके अतिरिक्त, यौम-ए-आराफ़ा के दिन रोज़ा रखना गैर-हाजी मुसलमानों के लिए अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। पैगंबर मुहम्मद से वर्णित हदीस के अनुसार, इस दिन का रोज़ा रखने से पिछले और अगले वर्ष के पापों की क्षमा का आश्वासन मिलता है। इस दिन को दया और क्षमा का विशेष अवसर माना गया है, जिसमें ईश्वर अपने बंदों को नरक की आग से मुक्ति प्रदान करने का उल्लेख करते हैं।
इस प्रकार, यौम-ए-आराफ़ा न केवल हज का केंद्रीय चरण है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, प्रार्थना और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का वह दिव्य अवसर है, जिसे इस्लामी परंपरा में अत्यंत पवित्र और निर्णायक माना जाता है। यह दिन वैश्विक मुस्लिम समुदाय के लिए आस्था, एकता और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक बनकर हर वर्ष गहरी धार्मिक संवेदना के साथ मनाया जाता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
