तुलसी विवाह हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और पावन पर्व है। जिसे हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माँ तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरुप से कराया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में तुलसी माता, राक्षस जालंधर और भगवान विष्णु का आपस में गहरा संबंध था। दैत्यराज जालंधर ने समुद्र मंथन से उत्पन्न होकर अपने साहस और पराक्रम से सभी देवताओं और मनुष्यों में अपनी शक्ति का डंका बजाया। जालंधर की शक्ति का रहस्य था उसकी पतिव्रता पत्नी वृंदा, जो पूरी निष्ठा और भक्ति से अपने पति की रक्षा करती थी।


दैत्यराज कालनेमी की पुत्री वृंदा का विवाह असुरराज जालंधर से हुआ था। वृंदा अत्यंत पतिव्रता स्त्री थी, और उसके पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न तो मारा जा सकता था, न ही पराजित। इसलिए देवताओं के लिए जालंधर का वध करने हेतु, वृंदा के पतिव्रत धर्म का भंग करना अनिवार्य था। अपनी शक्ति और अहंकार में डूबे जालंधर ने माता लक्ष्मी को प्राप्त करने की इच्छा से युद्ध किया, परंतु जब लक्ष्मी ने उसे समुद्र से उत्पन्न होने के कारण भाई समान माना, तो वह पराजित होकर कैलाश पर्वत पहुँच गया। वहां उसने देवी पार्वती को पाने की अभिलाषा व्यक्त की और स्वयं को भगवान शिव का रूप धर कर उनके समीप गया। परंतु देवी पार्वती ने अपने तपोबल के प्रभाव से उसे तुरंत पहचान लिया और वहां से अदृश्य हो गईं।

इसके पश्चात क्रोधित पार्वती ने सारा प्रसंग भगवान विष्णु को बताया। तब भगवान विष्णु ऋषि का रूप धारण कर उस वन में पहुँचे जहाँ वृंदा अकेली थीं। उनके साथ दो मायावी राक्षस भी थे। उन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गईं, तो ऋषि रूपी विष्णु ने क्षण भर में दोनों राक्षसों को भस्म कर दिया। उनकी अद्भुत शक्ति देखकर वृंदा ने अपने पति जालंधर के युद्ध का हाल पूछा। तब भगवान ने माया से दो वानर प्रकट किए, एक के हाथ में जालंधर का सिर था और दूसरे के हाथ में उसका धड़। यह देख वृंदा मूर्छित होकर गिर पड़ीं। जब वह होश में आईं, तो उन्होंने ऋषि से अपने पति को जीवित करने की प्रार्थना की। तब भगवान ने माया से सिर और धड़ को जोड़ दिया और स्वयं उस शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को यह छल समझ में नहीं आया और वह जालंधर प्रतीत हो रहे विष्णु के साथ पत्नी धर्म का पालन करने लगीं। इसी से उसका सतीत्व भंग हो गया, और उसी क्षण जालंधर अपनी शक्ति खोकर युद्ध में पराजित हो गया।


जब उसे इस छल का पता चला, तो वृंदा ने भगवान विष्णु को कड़ा श्राप दिया कि वे काले पत्थर अर्थात् शालिग्राम रूप में अवतरित होंगे। श्राप के प्रभाव से भगवान विष्णु शालिग्राम बन गए, जिससे ब्रह्मांड में असंतुलन पैदा हो गया। देवी देवताओं ने वृंदा से आग्रह किया कि वे विष्णु को इस श्राप से मुक्ति दें। वृंदा ने श्राप तो हटा दिया, लेकिन अपनी छवि की रक्षा करते हुए आत्मदाह कर दिया। जहां उनकी भूसी गिरी, वहां से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। भगवान विष्णु ने वृंदा को तुलसी का अवतार दी और कहा कि वे सदा उनके साथ रहेंगी। तब से प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की एकादशी को भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप और तुलसी के विवाह का पावन समारोह मनाया जाता है। इसे तुलसी विवाह कहा जाता है, जो विवाह ऋतु की शुरुआत का संकेत है और यह विवाह सभी बाधाओं को दूर करने वाला शुभ आयोजन माना जाता है।

तुलसी विवाह के इस पर्व में भगवान विष्णु (शालिग्राम) और तुलसी माता का सांकेतिक विवाह होता है। यह पूजा और विवाह धार्मिक अनुशासन, मनोकामना पूर्ति और धन-समृद्धि के लिए विशेष महत्व रखता है। यह कथा भारतीय संस्कृति, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं में गहराई से जुड़ी हुई है और आज भी श्रद्धालु इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं।



Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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