मानव जीवन में पूजा-पाठ, साधना और तपस्या का विशेष स्थान है, लेकिन इन धार्मिक कर्मों की सिद्धि केवल मंत्रों या विधि-विधानों से ही नहीं, बल्कि उचित आसन पर बैठने से भी जुड़ी होती है। ब्रह्मांड पुराण और तंत्रसार जैसे प्राचीन ग्रंथों में बताया गया है कि साधना या पूजा के समय उपयोग किया जाने वाला आसन साधक की सफलता, ऊर्जा और आध्यात्मिक प्रगति में निर्णायक भूमिका निभाता है।

शास्त्रों के अनुसार, भूमि पर सीधे बैठकर पूजा करने से दुख प्राप्त होता है, पत्थर पर बैठने से रोग उत्पन्न होते हैं, पत्तों पर बैठने से मन में भ्रम पैदा होता है और लकड़ी पर बैठने से दुर्भाग्य का सामना करना पड़ता है। वहीं, घास-फूस पर बैठने से अपयश मिलता है, कपड़े पर बैठने से तपस्या की शक्ति कम हो जाती है और बांस के आसन से दरिद्रता आती है। यही कारण है कि धर्मशास्त्रों में बिना आसन बिछाए कोई भी धार्मिक कर्मकांड करने को अधूरा माना गया है।

प्राचीन काल में ऋषि-मुनि विशेष प्रकार के आसनों का प्रयोग करते थे। काले हिरण के चर्म से बने आसन पर बैठने से ज्ञान की प्राप्ति होती है, कुशासन पर जप करने से सभी मंत्र सिद्ध होते हैं, जबकि गोबर के चौके पर बैठने से शरीर और वातावरण की पवित्रता बनी रहती है। बाघ या चीते के चर्म से बने आसन से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है, वहीं लाल कंबल के आसन से इच्छित कार्यों में सफलता मिलती है।

आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो साधु-संत और महात्मा नियमित रूप से जप-तप करते हैं। उनके भीतर निरंतर साधना से विशेष प्रकार की ऊर्जा संचित होती है, जो उनके व्यक्तित्व को तेजस्वी और प्रभावशाली बनाती है। इसी कारण वे पूजा के समय ऐसे आसनों का चयन करते हैं जो विद्युत के कुचालक हों। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि सुचालक आसन के माध्यम से शरीर की ऊर्जा भूमि में प्रवाहित होकर व्यर्थ हो सकती है, जबकि कुचालक आसन उसे सुरक्षित रखता है, जिससे साधना का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

धर्म और विज्ञान, दोनों दृष्टियों से यह स्पष्ट होता है कि पूजा-पाठ या साधना के समय सही आसन का चयन केवल परंपरा नहीं, बल्कि ऊर्जा संरक्षण और मन की स्थिरता का वैज्ञानिक आधार भी है। यही कारण है कि प्राचीन ऋषि-मुनियों की परंपरा आज भी प्रत्येक धार्मिक कर्मकांड में आसन के महत्व को सर्वोच्च स्थान देती है।

Pratahkal Bureau

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