मार्च में मनाया जाने वाला 'चापचर कुट' आखिर क्यों है इतना खास? जानिए मिजोरम के इस अनोखे त्योहार की दिलचस्प कहानी..
मिजोरम का पारंपरिक त्योहार चापचर कुट हर वर्ष मार्च में उत्साह के साथ मनाया जाता है। झूम खेती की परंपरा से जुड़े इस उत्सव की शुरुआत 15वीं–17वीं शताब्दी के बीच मानी जाती है।

चापचर कुट 2023
भारत के उत्तर–पूर्वी राज्य मिजोरम की सांस्कृतिक पहचान में कई ऐसे पारंपरिक पर्व शामिल हैं, जो सदियों पुरानी जीवनशैली, प्रकृति के प्रति आस्था और सामुदायिक एकता को दर्शाते हैं। इन्हीं में से एक है चापचर कुट, जो हर वर्ष मार्च के महीने में बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व न केवल मिजो समाज की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, बल्कि उनके इतिहास, कृषि परंपरा और सामुदायिक जीवन की झलक भी प्रस्तुत करता है।
जूम खेती से जुड़ी परंपरा से जन्मा पर्व:
ऐतिहासिक और लोक परंपराओं के अनुसार, चापचार कुट की शुरुआत लगभग 1450 से 1700 ईस्वी के बीच मानी जाती है। इसका प्रारंभ मिजो समुदाय के एक गांव सेइपुई से हुआ था। उस समय पहाड़ी ढलानों पर झूम खेती (जंगल साफ करके खेती करने की परंपरा) की जाती थी। खेती शुरू करने से पहले जंगलों की सफाई का काम किया जाता था, जो काफी जोखिम भरा होता था। ऐसे में जंगल साफ करने की प्रक्रिया के दौरान सुरक्षित रहने के लिए लोग अपने देवताओं को धन्यवाद देने के उद्देश्य से इस उत्सव का आयोजन करते थे। धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे क्षेत्र में फैल गई और समय के साथ यह मिजोरम के प्रमुख सांस्कृतिक त्योहारों में शामिल हो गई।
एक अनोखी घटना से मिली परंपरा को नई पहचान:
लोककथाओं के अनुसार, एक बार गांव के शिकारी शिकार के लिए जंगल गए लेकिन वे खाली हाथ लौट आए। इस निराशा को दूर करने के लिए गांव के मुखिया ने अचानक एक सामूहिक भोज का आयोजन किया। इसमें चावल से बनी पारंपरिक मदिरा और मांस परोसा गया तथा पूरे गांव ने नृत्य और संगीत के साथ उत्सव मनाया। यह आयोजन इतना लोकप्रिय हुआ कि इसके बाद से हर वर्ष इसी तरह का उत्सव मनाया जाने लगा और धीरे-धीरे यह परंपरा अन्य गांवों में भी फैल गई।
सांस्कृतिक रंगों से सजा उत्सव:
आज चापचर कुट केवल धार्मिक या कृषि से जुड़ा त्योहार नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक महोत्सव के रूप में विकसित हो चुका है। इस अवसर पर लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं, लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। उत्सव के दौरान आयोजित प्रमुख गतिविधियाँ इस प्रकार हैं:
- चह्वांग्ह्नाव (Chhawnghnawh) – एक पारंपरिक खेल जिसमें लोग एक-दूसरे के मुंह में उबला हुआ अंडा मज़ाकिया अंदाज में डालते हैं।
लोकनृत्य प्रदर्शन –
- चेराव नृत्य (बांस के साथ किया जाने वाला प्रसिद्ध नृत्य)
- खुआल्लाम, छेहलाम, चाई नृत्य, सर्लमकाई
- संगीत और गायन – पारंपरिक तथा आधुनिक दोनों प्रकार की प्रस्तुतियाँ
- कला और शिल्प प्रदर्शनी
- फोटो प्रदर्शनी और सांस्कृतिक प्रदर्शन
- चापचार कुट रन (दौड़ प्रतियोगिता)
- मिजो पारंपरिक खेल, पारंपरिक परिधान परेड
- कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर पारंपरिक पोशाक पहनने की परंपरा
- जातीय व्यंजनों के स्टॉल
पारंपरिक परिधान और नृत्य की खास पहचान:
उत्सव के दौरान महिलाएँ वकीरिया (Vakiria) नामक पारंपरिक पोशाक पहनती हैं, जो मिजो संस्कृति का प्रतीक मानी जाती है। रात भर चलने वाले नृत्य और गीत इस त्योहार की विशेष पहचान हैं। विशेष रूप से चेराव नृत्य, जिसमें बांस की लाठियों के बीच तालबद्ध कदमों से नृत्य किया जाता है, इस पर्व का सबसे आकर्षक हिस्सा माना जाता है। इसके अलावा चाई नृत्य की उत्पत्ति भी इसी उत्सव से मानी जाती है।
आज चापचर कुट केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि मिजोरम की सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक एकता और परंपराओं के संरक्षण का जीवंत प्रतीक बन चुका है। यह उत्सव लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराता है। हर वर्ष मार्च में मनाया जाने वाला यह पर्व यह भी दर्शाता है कि आधुनिकता के दौर में भी परंपराएँ समाज को जोड़ने और उसकी सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
