क्या है गुढी बनाने की विधि का वास्तविक अर्थ? क्यों इसी दिन से शुरु होता है हिंदुओं का नववर्ष?
महाराष्ट्र और कोंकण में गुढी पाडवा का पर्व हिंदू नववर्ष और विक्रम संवत के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। जानिए भगवान ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना, भगवान राम की विजय गाथा और शालिवाहन शक से जुड़े इस पर्व का धार्मिक, खगोलीय और प्राकृतिक महत्व। नीम-गुड़ के सेवन और गुढी स्थापना की परंपरा के साथ मनाएं यह पावन उत्सव।

प्रकृति के नव-शृंगार और सनातन संस्कृति के गौरवशाली इतिहास को स्वयं में समेटे 'गुढी पाडवा' का पर्व संपूर्ण महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में अत्यंत उत्साह और पारंपरिक निष्ठा के साथ मनाया जा रहा है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होने वाला यह उत्सव न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह ब्रह्मांड की रचना, बुराई पर अच्छाई की विजय और नए संकल्पों का जीवंत प्रतीक है। हिंदू नववर्ष यानी विक्रम संवत का शुभारंभ इसी पावन दिवस से होता है, जो खगोलीय, प्राकृतिक और पौराणिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस पर्व की सार्थकता इसके नाम में ही निहित है, जहाँ 'गुढी' का अर्थ विजय पताका या ऊंचा फहराया जाने वाला झंडा है और 'पाडवा' संस्कृत शब्द 'प्रतिपदा' से व्युत्पन्न है, जो चंद्र कैलेंडर के प्रथम दिन को इंगित करता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना कर सत्ययुग का सूत्रपात किया था। साथ ही, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम द्वारा रावण का वध कर अयोध्या आगमन पर प्रजा ने विजय पताका फहराकर खुशियाँ मनाई थीं। ऐतिहासिक दृष्टि से राजा शालिवाहन द्वारा शकों पर प्राप्त की गई ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में इसी दिन से 'शालिवाहन शक' कैलेंडर की शुरुआत हुई थी।
गुढी पाडवा की परंपरा अत्यंत विशिष्ट और वैज्ञानिक है। घर के मुख्य द्वार या खिड़की पर एक लंबी बांस की लकड़ी पर नए रेशमी पीले, हरे या लाल वस्त्र बांधकर गुढी स्थापित की जाती है। इसके शीर्ष पर नीम की पत्तियां, गाठी यानी चीनी के दानों की माला, फूलों का हार और उसके ऊपर तांबे या चांदी के कलश को उल्टा रखकर सजाया जाता है। हल्दी और कुमकुम से सुसज्जित यह गुढी सुख-समृद्धि और विजय का संदेश देती है। इस दिन खान-पान की परंपरा जीवन के दर्शन को दर्शाती है, जिसमें सुबह सबसे पहले नीम की कड़वी पत्तियों को गुड़, नमक और इमली के साथ मिलाकर सेवन किया जाता है। यह विधान मनुष्य को यह सीख देता है कि जीवन कड़वाहट और मिठास का एक संतुलित मिश्रण है।
खगोलीय और प्राकृतिक रूप से भी यह समय एक महान परिवर्तन का साक्षी होता है। अमावस्या के पश्चात चंद्रमा का वर्धन, दिन की अवधि में विस्तार और वसंत ऋतु के आगमन से प्रकृति का पुनर्जन्म होता है। पेड़ों पर नए पत्ते, खिले हुए फूल और कृषि के नए चक्र का प्रारंभ इसी कालखंड में होता है। महाराष्ट्र के घरों में इस अवसर पर पुरण पोली और श्रीखंड-पूरी जैसे विशेष पकवान बनाए जाते हैं और आंगन को आकर्षक रंगोलियों से सजाया जाता है। विशेष बात यह है कि इसी दिन को दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक राज्यों में 'उगादि' के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की उस एकता और प्राचीन ज्ञान का परिचायक है जो हज़ारों वर्षों से जनमानस को नई ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ नववर्ष के स्वागत के लिए प्रेरित करता आ रहा है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
