भारतीय समाज में परंपराएं केवल रीति-रिवाज नहीं होतीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्थाओं और विश्वासों का प्रतिबिंब भी होती हैं। ऐसी ही एक परंपरा है खरमास के दौरान विवाहित महिलाओं का मायके न जाना, जिसे आज भी देश के कई हिस्सों में गंभीरता से माना जाता है। यह मान्यता विशेष रूप से ग्रामीण और पारंपरिक परिवारों में प्रचलित है, जहां धार्मिक पंचांग और ज्योतिषीय गणनाओं का सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव देखने को मिलता है।


विशेषज्ञों का मानना है कि खरमास से जुड़ी ये धारणाएं धार्मिक और सांस्कृतिक विश्वासों पर आधारित हैं, न कि किसी वैज्ञानिक या कानूनी नियम पर। इसके बावजूद, यह परंपरा भारतीय समाज में आज भी आस्था, सम्मान और पारिवारिक संतुलन का प्रतीक बनी हुई है।

हिंदू पंचांग के अनुसार खरमास वह अवधि होती है जब सूर्य धनु या मीन राशि में प्रवेश करता है। इस काल को ज्योतिष शास्त्र में अशुभ या मांगलिक कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना गया है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार इस दौरान विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। इसी कड़ी में विवाहित बेटी का मायके जाना भी कई क्षेत्रों में “शुभ यात्रा” की श्रेणी में रखा गया, जिसे खरमास में टालने की परंपरा विकसित हुई।

लोकविश्वासों के अनुसार, इस अवधि में बेटी का मायके जाना माता-पिता के घर की समृद्धि और सुख-शांति से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि यदि खरमास में विवाहित बेटी मायके आती है, तो इससे परिवार पर आर्थिक संकट या अन्य प्रकार की परेशानियां आ सकती हैं। हालांकि इन धारणाओं के पीछे कोई लिखित शास्त्रीय आदेश नहीं मिलता, फिर भी सामाजिक परंपराओं ने इन्हें मजबूत आधार प्रदान किया।

धार्मिक दृष्टिकोण से खरमास को धार्मिक ऊर्जा का क्षीण काल माना जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस समय सूर्य की स्थिति कमजोर होती है, जिसके कारण नए या परिवर्तन से जुड़े कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है। यही कारण है कि यात्रा, नए निर्णय या पारिवारिक बदलावों को भी टालने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है।

हालांकि समय के साथ सामाजिक सोच में बदलाव भी स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है। शहरी क्षेत्रों और शिक्षित परिवारों में इन मान्यताओं को आस्था से अधिक परंपरा के रूप में देखा जा रहा है। कई परिवार परिस्थितियों, आवश्यकता और आपसी सहमति के आधार पर निर्णय लेने लगे हैं। आपात स्थितियों, स्वास्थ्य कारणों या पारिवारिक जरूरतों के चलते खरमास की परंपरा को कठोरता से नहीं अपनाया जा रहा।

खरमास में मायके न जाने की परंपरा भारतीय संस्कृति की उस जटिल संरचना को दर्शाती है, जहां विश्वास, लोकाचार और आधुनिक सोच एक-दूसरे के साथ निरंतर संवाद में रहते हैं। बदलते समय के साथ इन परंपराओं की व्याख्या भी बदल रही है, लेकिन उनका सांस्कृतिक महत्व आज भी बना हुआ है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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