कौन थे विश्वकर्मा? और फैक्ट्री से लेकर आईटी हब तक, क्यों हर सफल प्रोफेशनल मनाता है विश्वकर्मा जयंती...
ब्रह्मांड के प्रथम इंजीनियर भगवान विश्वकर्मा की जयंती 31 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। द्वारका और स्वर्ण लंका जैसे पौराणिक नगरों के निर्माता की इस विशेष माघ त्रयोदशी पूजा का महत्व, शिल्पकारों की परंपरा और आधुनिक औद्योगिक क्षेत्र में मशीनों की पूजा से जुड़ी पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें। जानिए कैसे यह दिन तकनीक और श्रद्धा का संगम बनता है।

नई दिल्ली: सनातन परंपरा में निर्माण, शिल्प और तकनीक के अधिष्ठाता भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का प्रथम इंजीनियर और देवताओं का वास्तुकार माना जाता है। इस वर्ष 31 जनवरी 2026 को माघ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर 'माघ विश्वकर्मा जयंती' का पावन पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। यद्यपि कन्या संक्रांति के अवसर पर सितंबर माह में विश्वकर्मा पूजा का व्यापक प्रचलन है, किंतु माघ मास की यह तिथि धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखती है, जो सृजन की शक्ति और मानवीय कौशल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने ही इस सृष्टि की संरचनात्मक रूपरेखा तैयार की थी। उनके शिल्प कौशल की अद्भुत मिसालें आज भी हिंदू धर्मग्रंथों के पन्नों में जीवंत हैं। भगवान कृष्ण की भव्य द्वारका नगरी से लेकर पांडवों के इंद्रप्रस्थ और रावण की वैभवशाली स्वर्ण लंका तक, सभी का निर्माण उनके अद्वितीय वास्तु ज्ञान का परिणाम माना जाता है। केवल नगर ही नहीं, बल्कि देवताओं की सुरक्षा और शक्ति के प्रतीक अस्त्र-शस्त्र जैसे भगवान शिव का अमोघ त्रिशूल और श्रीहरि विष्णु का सुदर्शन चक्र भी उन्हीं की देन हैं। यह उनकी दूरदर्शिता ही थी जिसने देवताओं को सामरिक और वास्तुशिल्प के क्षेत्र में अजेय बनाया।
यह पर्व विशेष रूप से उन कर्मयोगियों के लिए समर्पित है जो अपनी रचनात्मकता और परिश्रम से समाज की नींव को सुदृढ़ करते हैं। शिल्पकार, कारीगर, लोहार, बढ़ई और कुम्हार इन्हें अपने कुलदेवता के रूप में पूजते हैं। आधुनिक युग में यह उत्सव केवल पारंपरिक व्यवसायों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि औद्योगिक क्षेत्रों, कारखानों और तकनीकी संस्थानों में भी इसका गहरा प्रभाव देखा जाता है। इस दिन फैक्ट्रियों और वर्कशॉप में मशीनों तथा औजारों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। परंपरा के अनुसार, इस दिन कारीगर अपने अस्त्रों और उपकरणों का प्रयोग नहीं करते, बल्कि उन्हें विश्राम देकर उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हैं।
उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में इस दिन विशेष रौनक दिखाई देती है, जहाँ सामुदायिक आयोजन और हवन किए जाते हैं। वहीं दक्षिण भारत में इन्हें 'विश्वरूप' अवतार के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है। यह मान्यता जनमानस में गहराई से व्याप्त है कि इस दिन यंत्रों और औजारों की विधि-विधान से पूजा करने से कार्यक्षेत्र में कुशलता बढ़ती है और वर्ष भर तकनीकी बाधाएं दूर रहती हैं। भगवान विश्वकर्मा की यह जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि विकास और निर्माण की हर प्रक्रिया के पीछे एक दिव्य कौशल और अथक परिश्रम निहित है, जो आधुनिक इंजीनियर्स और आर्किटेक्ट्स के लिए आज भी प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
