कौन थे संत तुकाराम? और क्यों इस महान संत को डुबानी पड़ी अपनी ही गाथा?
17वीं सदी में संत तुकाराम महाराज को अपनी 'गाथा' इंद्रायणी नदी में क्यों डुबोनी पड़ी? जानिए उस ऐतिहासिक घटना और 13 दिनों के चमत्कार की पूरी कहानी जिसने भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी। रामेश्वर भट्ट का विरोध और विठोबा की कृपा की अद्भुत दास्तां पढ़ने के लिए क्लिक करें।

17वीं शताब्दी के महाराष्ट्र का सामाजिक और धार्मिक परिदृश्य उस समय पूरी तरह बदल गया, जब एक साधारण दुकानदार ने वेदों के एकाधिकार को चुनौती दी। वारकरी संप्रदाय के सबसे सशक्त हस्ताक्षर और 'जगतगुरु' की उपाधि से विभूषित संत तुकाराम महाराज का जीवन केवल भक्ति की कहानी नहीं, बल्कि तत्कालीन रूढ़िवाद के खिलाफ एक मौन क्रांति थी। इतिहास में दर्ज 'तुकाराम गाथा' को इंद्रायणी नदी में जलमग्न करने की घटना आज भी आस्था और संघर्ष का एक जीवंत दस्तावेज मानी जाती है।
पुणे के निकट देहू गाँव में जन्मे संत तुकाराम, जिन्हें उनके अनुयायी प्रेम से 'तुकोबा' कहते हैं, जाति से कुनबी थे। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में धर्म, वेद और ईश्वर की व्याख्या का अधिकार केवल उच्च वर्ण (ब्राह्मणों) के पास सुरक्षित था। तुकाराम महाराज ने संस्कृत की दुरूहता को छोड़कर आम जनमानस की भाषा 'मराठी' में ईश्वर भक्ति और समाज सुधार के अभंग (भक्ति गीत) रचना शुरू किया।
उनकी बढ़ती लोकप्रियता और उनके अभंगों में छिपे वेदों के सार ने तत्कालीन धर्मगुरुओं की सत्ता को हिला दिया। यह संघर्ष तब चरम पर पहुँच गया जब धर्म के स्वयंभू रक्षक और विद्वान रामेश्वर भट्ट ने तुकाराम महाराज के लेखन को धर्मशास्त्रों के विरुद्ध घोषित कर दिया।
इंद्रायणी नदी में 'गाथा' का विसर्जन
रामेश्वर भट्ट और अन्य कट्टरपंथी विद्वानों का तर्क था कि एक 'शूद्र' को वेदों का उपदेश देने या अभंग रचने का कोई अधिकार नहीं है। तुकाराम महाराज पर धर्म भ्रष्ट करने का आरोप लगाते हुए, रामेश्वर भट्ट ने एक फरमान जारी किया। उन्होंने तुकाराम महाराज के समक्ष एक कड़ी शर्त रखी:
"यदि तुम सच्चे भक्त हो और तुम्हारे अभंगों में ईश्वरीय सत्य है, तो अपनी इन हस्तलिखित पोथियों (गाथा) को इंद्रायणी नदी में डुबो दो। यदि ईश्वर ने इन्हें बचाया, तो तुम्हारी भक्ति सत्य मानी जाएगी, अन्यथा तुम्हें लिखने का कोई अधिकार नहीं होगा।"
स्वभाव से विनम्र और विठोबा के प्रति समर्पित तुकाराम महाराज ने किसी भी प्रकार के सामाजिक विद्रोह के बजाय, भारी मन से अपनी जीवन भर की साधना—अपने अभंगों की पांडुलिपियों—को पत्थर से बांधकर इंद्रायणी नदी के गहरे जल में विसर्जित कर दिया।
13 दिन का अनशन और दैवीय चमत्कार
अपनी रचनाओं को जल समाधि देने के बाद, तुकाराम महाराज का हृदय विदीर्ण हो गया था। वे नदी के किनारे स्थित विट्ठल मंदिर के बाहर एक शिला पर बैठ गए और अन्न-जल का त्याग कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों और ऐतिहासिक आख्यानों के अनुसार, उन्होंने 13 दिनों तक कठोर उपवास रखा और भगवान विट्ठल से न्याय की गुहार लगाई।
घटना के 13वें दिन, जिसे आज भी वारकरी संप्रदाय में एक ऐतिहासिक क्षण माना जाता है, एक चमत्कार घटित हुआ। नदी में पत्थर के साथ डुबोई गई पोथियां अचानक जल की सतह पर तैरने लगीं। जब उन्हें बाहर निकाला गया, तो उपस्थित जनसमूह यह देखकर स्तब्ध रह गया कि पोथियां पूरी तरह सूखी थीं; पानी की एक बूंद भी स्याही को मिटा नहीं पाई थी।
घटना का प्रभाव और ऐतिहासिक महत्व
इस घटना ने न केवल तुकाराम महाराज की भक्ति को प्रमाणित किया, बल्कि सामाजिक और धार्मिक भेदभाव की जड़ों पर भी गहरा प्रहार किया।
- हृदय परिवर्तन: तुकाराम महाराज के सबसे बड़े आलोचक रामेश्वर भट्ट को अपनी गलती का अहसास हुआ और वे तुकाराम महाराज के शिष्य बन गए।
- लोकभाषा की जीत: इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि ईश्वर की भक्ति के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य नहीं है, और मराठी भाषा के साहित्य को एक नया सम्मान मिला।
- वारकरी संप्रदाय की मजबूती: यह घटना वारकरी संप्रदाय के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई, जिसने जाति-पाति के बंधनों को तोड़कर भक्ति का मार्ग सबके लिए खोल दिया।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
