तमिलनाडु के पवित्र तीर्थ नगर रामेश्वरम से जुड़ा एक प्राचीन आध्यात्मिक प्रसंग इन दिनों फिर चर्चा के केंद्र में है। यह कथा नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक माने जाने वाले महान योगी मच्छिंद्रनाथ और वानर रूप में उपस्थित हनुमान के बीच घटित उस असाधारण दिव्य घटना का वर्णन करती है, जिसमें योग, सिद्धि, शक्ति और करुणा का अद्वितीय संगम देखने को मिलता है। भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की यह गूढ़ परंपरा न केवल योग साधना की गहराई को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सनातन संस्कृति में शक्ति से ऊपर विवेक और मर्यादा को स्थान दिया गया है।

परंपरागत कथाओं के अनुसार, नाथ संप्रदाय के संस्थापक, हठयोग के पुनरुत्थानकर्ता और भगवान शिव से दीक्षा प्राप्त महायोगी मच्छिंद्रनाथ, जिन्हें मात्स्येन्द्र, मच्छिंद्र, मीनपा और तमिल सिद्ध परंपरा में मछमुनि के नाम से भी जाना जाता है, पूर्व दिशा की तीर्थ यात्रा पूर्ण कर रामेश्वरम पहुंचे थे। यहां उन्होंने समुद्र में विधिवत स्नान किया और लौटते समय चट्टानों के बीच एक वृद्ध वानर को देखा, जो मूसलाधार वर्षा और ठंड से कांपते हुए पत्थरों को जोड़कर आश्रय बनाने का प्रयास कर रहा था।

इस दृश्य को देखकर मच्छिंद्रनाथ ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा कि संकट के समय घर बनाना, आग लगने के बाद कुआं खोदने के समान है। वह वृद्ध वानर वास्तव में हनुमान थे, जिन्होंने लघुरूप धारण किया हुआ था। योगी मच्छिंद्रनाथ उन्हें पहचान नहीं सके। मच्छिंद्रनाथ के शब्दों को शांत भाव से सुनते हुए हनुमान ने उनसे परिचय पूछा। जब मच्छिंद्रनाथ ने स्वयं को महान जती बताया, तो हनुमान ने उत्तर दिया कि उनके ज्ञान में केवल एक ही सच्चे जती हैं और वह स्वयं मारुति हैं।

यहीं से दोनों के बीच दिव्य शक्तियों के प्रदर्शन की चुनौती आरंभ हुई। हनुमान ने विशाल रूप धारण कर पर्वतों को उठाया और उन्हें मच्छिंद्रनाथ की ओर फेंकना शुरू किया। सात पर्वत पार से आए इन प्रचंड प्रहारों को देखकर मच्छिंद्रनाथ समझ गए कि यह कोई साधारण वानर नहीं, बल्कि स्वयं मारुतीराय हैं। उन्होंने “अलख निरंजन, जय दत्तगुरु” का घोष करते हुए भस्म की चिमुट फेंकी और वाताकर्षण मंत्र के प्रभाव से सभी पर्वतों को आकाश में स्थिर कर दिया।

इसके बाद हनुमान और अधिक क्रोधित हुए और एक और पर्वत फेंका। तब मच्छिंद्रनाथ ने समुद्र का जल अपने हाथ में लेकर मंत्रोच्चार किया और उसे हनुमान की ओर फेंक दिया। इस दिव्य अस्त्र के प्रभाव से हनुमान के चारों ओर वायु का बंधन बन गया और वे पर्वत सहित स्थिर हो गए। स्थिति गंभीर होती देख वायुदेव, अपने पुत्र हनुमान की दयनीय अवस्था से व्याकुल होकर मच्छिंद्रनाथ की शरण में पहुंचे और क्षमा याचना की।

वायुदेव की प्रार्थना से द्रवित होकर मच्छिंद्रनाथ ने अभिमंत्रित जल हनुमान पर छिड़का। इसके प्रभाव से पर्वत अपने स्थान पर लौट गए और वातप्रेरक अस्त्र का प्रभाव समाप्त होते ही हनुमान पुनः सामान्य देहस्थिति में आ गए। इस प्रकार यह दिव्य संघर्ष करुणा, संतुलन और मर्यादा के साथ समाप्त हुआ।

रामेश्वरम से जुड़ा यह आध्यात्मिक प्रसंग मच्छिंद्रनाथ, हनुमान और वायुदेव जैसे महान पात्रों की शक्तियों के साथ-साथ उनकी मर्यादा और करुणा को भी उजागर करता है। नाथ संप्रदाय, सिद्ध परंपरा और सनातन संस्कृति की यह कथा आज भी यह संदेश देती है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति का उद्देश्य संघर्ष नहीं, बल्कि संतुलन और कल्याण है, और यही इसकी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्ता को स्थायी बनाता है।

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Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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