कौन हैं सौंदत्ती की देवी यल्लम्मा? और क्यों भगवान परशुराम की माँ को अपना आराध्य मानते है किन्नर?
कर्नाटक के सौंदत्ती में माघ पूर्णिमा पर उमड़ा किन्नर समुदाय का सैलाब, जहाँ देवी रेणुका यल्लम्मा के दरबार में आस्था और समावेश की अनूठी मिसाल दिखती है। जानिए भगवान परशुराम की माता और उपेक्षितों की रक्षक 'सबकी माँ' यल्लम्मा के साथ किन्नर समुदाय के गहरे पौराणिक और सांस्कृतिक संबंध की पूरी गाथा, जो सदियों से चली आ रही जोगवा परंपरा को जीवंत करती है।

बेलगावी। श्रद्धा और शक्ति का एक ऐसा अद्भुत स्वरूप, जहाँ लिंग, जाति और वर्ग की तमाम सीमाएं टूटकर भक्ति के सागर में विलीन हो जाती हैं—यह दृश्य है कर्नाटक के बेलगावी जिले में स्थित सौंदत्ती का। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी रेणुका यल्लम्मा, जिन्हें 'सबकी माता' कहा जाता है, न केवल उत्तर कर्नाटक और महाराष्ट्र के लाखों श्रद्धालुओं की आराध्य हैं, बल्कि वे किन्नर समुदाय (मंगलमुखी) के लिए अस्तित्व और सम्मान की सबसे बड़ी पहचान भी हैं। माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर यहाँ आयोजित होने वाला 'यल्लम्मा देवी मेला' केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह हाशिए पर धकेले गए समाज के पुनर्जन्म और उनकी अटूट आस्था का जीवंत दस्तावेज है।
पौराणिक गाथाओं के पन्नों को पलटें तो देवी रेणुका का जीवन त्याग, परीक्षा और दिव्य पुनरुत्थान की एक जटिल कथा है। ऋषि जमदग्नि की पत्नी और भगवान परशुराम की माता रेणुका को एक क्षणिक मानसिक विचलन के कारण अपने ही पुत्र के हाथों मृत्यु का वरण करना पड़ा था। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने माता का मस्तक धड़ से अलग कर दिया, किंतु बाद में पिता से मिले वरदान के रूप में उन्हें पुनर्जीवित भी कराया। मान्यताओं के अनुसार, इस अलौकिक पुनर्जन्म की प्रक्रिया में देवी का स्वरूप एक ऐसे बिंदु पर पहुँचा जहाँ वे समावेशी हो गईं। यही वह आध्यात्मिक कड़ी है, जिससे किन्नर समुदाय स्वयं को जोड़कर देखता है। पुरुष और स्त्री दोनों के गुणों का संगम होने के कारण, किन्नर समाज देवी के इस 'विभक्त' और 'पुनर्जीवित' स्वरूप में अपनी छवि पाता है।
सौंदत्ती की इस धरती पर 'जोगती' और 'जोगप्पा' की परंपरा सदियों से चली आ रही है। यहाँ 'जोगप्पा' के रूप में पुरुष, स्त्री वेश धारण कर देवी की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। यह परंपरा सामाजिक और धार्मिक स्तर पर लिंग की रूढ़िवादी सीमाओं को धुंधला कर देती है, जिससे किन्नर समुदाय को यहाँ एक स्वाभाविक स्वीकृति और सम्मानजनक पहचान प्राप्त होती है। जब इतिहास के विभिन्न कालखंडों में समाज ने इस समुदाय को मुख्यधारा से पृथक कर दिया था, तब देवी यल्लम्मा के दरबार ने उन्हें 'उपेक्षितों की माता' बनकर सहारा दिया।
माघ पूर्णिमा के दिन यहाँ का वातावरण 'जोगवा' नृत्य और देवी के जयकारों से गूंज उठता है। हजारों की संख्या में देश भर से जुटे किन्नर इस दिन विशेष स्नान के पश्चात देवी को अपना 'सुहाग' समर्पित करते हैं। पल्लकी उत्सव के दौरान उनका नृत्य और गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उनके संघर्षों और दुखों को देवी के चरणों में सौंपने का एक माध्यम है। वे देवी को अपनी रक्षक और कुलदेवी मानते हुए उनसे सौभाग्य का आशीर्वाद मांगते हैं।
सौंदत्ती का यह शक्तिपीठ आज के आधुनिक समाज के लिए सामाजिक समावेश का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश करता है। जहाँ एक ओर दुनिया अब भी लिंग समानता और समावेशिता पर चर्चा कर रही है, वहीं यल्लम्मा देवी का यह दरबार सदियों से यह संदेश दे रहा है कि भक्ति के मार्ग पर कोई भी व्यक्ति अछूत या उपेक्षित नहीं है। यहाँ की मिट्टी में रची-बसी यह आस्था प्रमाणित करती है कि जब मानवीय संवेदनाएं और धार्मिक विश्वास मिलते हैं, तो वे एक ऐसे समाज का निर्माण करते हैं जहाँ हर पहचान को 'माँ' का आंचल नसीब होता है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
