हर वर्ष 25 दिसंबर को कई उत्तर भारतीय परिवारों में तुलसी पूजन की अनोखी परंपरा देखी जाती है। यह दिन क्रिसमस के रूप में भी जाना जाता है, लेकिन कुछ राज्यों और परिवारों में इसे तुलसी की आराधना से जोड़ा जाता है। सवाल उठता है, इस परंपरा की शुरुआत कब हुई, इसका धार्मिक या राजनीतिक आधार क्या है, और क्या इसे किसी आधिकारिक धर्मग्रंथ में समर्थन प्राप्त है?

विशेषज्ञों और पुरातन ग्रंथों की समीक्षा के अनुसार, तुलसी पूजन की परंपरा मूलतः वसंत या कार्तिक मास में अधिक मान्य है। लेकिन आधुनिक दौर में, 25 दिसंबर को इसे मनाने की शुरुआत हाल के दशकों में हुई है। सटीक वर्ष का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह माना जाता है कि यह प्रथा 1990 के दशक के बाद उत्तर भारत में लोकप्रिय हुई।

इसके पीछे कई सामाजिक और सांस्कृतिक कारण बताए जाते हैं। कुछ धार्मिक विद्वान इसे शुद्धिकरण और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति के प्रतीक के रूप में देखते हैं। हालांकि, इस तिथि को विशेष रूप से जोर देने का प्रयास कुछ विद्वानों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सांस्कृतिक संदेश और धार्मिक पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया। यह कदम क्रिसमस जैसे वैश्विक पर्वों के साथ भारतीय धार्मिक परंपराओं की प्रतिध्वनि के रूप में देखा जाता है।

धार्मिक ग्रंथों की ओर देखें तो तुलसी पूजन का विवरण वेद, पुराण या अन्य प्रमुख धर्मग्रंथों में इस तिथि के विशेष संदर्भ में नहीं मिलता। तुलसी वृक्ष की पूजा को सामान्यतः हर घर में दैनिक या तिथिविशेष पूजा में शामिल किया जाता है। इस दृष्टि से, 25 दिसंबर को तुलसी पूजन अधिकतर आधुनिक सामाजिक और सांस्कृतिक प्रथाओं का परिणाम है, न कि किसी शास्त्रिक आदेश का।

कानूनी दृष्टि से भी इस परंपरा को मान्यता देने या रोकने का कोई स्पष्ट आदेश नहीं है। यह धार्मिक और पारिवारिक स्वतंत्रता के दायरे में आता है। राज्य या केंद्र सरकार ने इस विशेष तिथि पर पूजा को लेकर कोई आधिकारिक निर्देश जारी नहीं किया है। फिर भी, कुछ समुदाय इसे धार्मिक जागरूकता और सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक कदम मानते हैं।

विवादों और चर्चा के बावजूद, 25 दिसंबर को तुलसी पूजन आज कई परिवारों के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का हिस्सा बन चुका है। यह न केवल एक धार्मिक प्रथा है, बल्कि समाज में परंपरा, पहचान और सांस्कृतिक जागरूकता का प्रतीक भी बनता जा रहा है।

इस परंपरा की पहचान यह दर्शाती है कि भारत में धर्म और संस्कृति की विविधता कितनी जीवंत है। जबकि पारंपरिक ग्रंथों में तिथियों का कोई विशेष उल्लेख नहीं, आधुनिक समाज ने इसे एक नया धार्मिक-सांस्कृतिक रूप देकर लोगों के जीवन में जगह दी है। इस तरह, 25 दिसंबर तुलसी पूजन का पर्व धार्मिक समर्पण और सांस्कृतिक प्रतीकों का अनूठा संगम बन गया है।

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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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