क्या है जोगवा परंपरा? माघ पूर्णिमा पर क्यों जगा लेकर चौडका नृत्य करते है जोगता- जोगती?
कर्नाटक के बेलगाम स्थित सौंदत्ती में माघ पूर्णिमा पर यल्लम्मा देवी मंदिर में श्रद्धा का महाकुंभ उमड़ा। जानिए क्यों देशभर के किन्नर और भक्त यहाँ 'जोगवा' परंपरा के जरिए अहंकार का त्याग कर माता रेणुका की शरण में आते हैं। प्राचीन शक्ति पीठ की पौराणिक कथा और सामाजिक समावेशिता को दर्शाता यह विशेष लेख भारतीय संस्कृति के गहरे रंगों और भक्ति की अनूठी परंपरा को उजागर करता है।

बेलगाम (कर्नाटक): कर्नाटक के बेलगाम जिले में स्थित सौंदत्ती की पहाड़ियां इन दिनों 'यल्लम्मा उदो-उदो' के जयकारों से गुंजायमान हैं। माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर यहाँ उमड़ने वाला जनसैलाब केवल एक धार्मिक मेले का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपरा, अटूट श्रद्धा और सामाजिक समावेशिता का एक अनूठा संगम है। रेणुका यल्लम्मा मंदिर में आयोजित इस वृहद आयोजन में देश के कोने-कोने से लाखों भक्त और विशेष रूप से मंगलमुखी (किन्नर) समुदाय के लोग अपनी कुलदेवी के चरणों में शीश नवाते हैं। शक्ति पीठों में शुमार यह पावन धाम उस समय अलौकिक दृश्य प्रस्तुत करता है जब हल्दी के पीले रंग (भंडारा) और नीम की पत्तियों की हरियाली के बीच भक्त भक्ति के परमानंद में डूब जाते हैं।
इस धार्मिक आयोजन की जड़ें पौराणिक आख्यानों में गहराई तक समाई हुई हैं। मान्यता है कि माता रेणुका, जो भगवान परशुराम की माता थीं, अपने पति ऋषि जमदग्नि के आदेश के उपरांत इसी स्थान पर पुनः पवित्र हुईं और अपने शक्ति स्वरूप को प्राप्त किया। यही कारण है कि माघ पूर्णिमा को उनके पुनर्जन्म और शुद्धि के पर्व के रूप में मनाया जाता है। विशेष रूप से किन्नर समुदाय के लिए यह स्थान सर्वोच्च तीर्थ है, क्योंकि वे यल्लम्मा देवी को एक ऐसी शक्ति के रूप में पूजते हैं जो लिंग और देह के बंधनों से परे है। इस दिन देशभर से आए मंगलमुखी देवी को अपना सुहाग अर्पित करते हैं और सामाजिक तिरस्कार से दूर एक आध्यात्मिक पहचान और सम्मान प्राप्त करते हैं।
सौंदत्ती के इस उत्सव का सबसे मर्मस्पर्शी और महत्वपूर्ण पहलू 'जोगवा' परंपरा है। 'जोगवा' का शाब्दिक अर्थ भले ही भिक्षा मांगना हो, परंतु इसका आध्यात्मिक विस्तार अहंकार के पूर्ण विनाश तक जाता है। जो भक्त स्वयं को देवी की सेवा में समर्पित कर देते हैं, वे 'जोगती' या 'जोगता' कहलाते हैं। दीक्षा के इस मार्ग पर चलने वाले साधक अपने गले में कौड़ियों (कवड़ी) की माला धारण करते हैं और मलप्रभा नदी के शीतल जल में स्नान कर अपनी आत्मा की शुद्धि करते हैं। इसके पश्चात, वे अपने सिर पर देवी की प्रतिमा युक्त पीतल का पात्र (जगा) रखकर 'चौडका' वाद्ययंत्र की थाप पर नृत्य करते हैं। यह नृत्य केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण की एक कलात्मक अभिव्यक्ति है।
जोगवा मांगने की यह प्रथा समाज को एक गहरा संदेश देती है। जब एक साधक हाथ में झोली लेकर द्वार-द्वार जाता है, तो वह अपने भीतर के 'मैं' यानी घमंड को त्याग देता है। यह परंपरा सिखाती है कि ईश्वर के समक्ष हर व्यक्ति रिक्त है। यहाँ जाति, धर्म, धन और पद की समस्त सीमाएं धूमिल हो जाती हैं। प्रशासन और मंदिर न्यास द्वारा इस विशाल जनसमूह के प्रबंधन के लिए कड़े इंतजाम किए जाते हैं, ताकि सदियों से चली आ रही यह विरासत सुचारू रूप से चलती रहे। यह मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न रहकर, आधुनिक समाज में उपेक्षित समुदायों के लिए सम्मानपूर्वक जीने और अपनी संस्कृति से जुड़ने का एक सशक्त मंच बन गया है।
अंततः, सौंदत्ती का यह मेला भारतीय संस्कृति की उस महानता का प्रमाण है जहाँ प्राचीन परंपराएं आज भी जीवित हैं और समाज के हर वर्ग को एक सूत्र में पिरोती हैं। यल्लम्मा देवी का यह दरबार आस्था के उस उजले पक्ष को दर्शाता है जहाँ मनुष्य अपने अहंकार की बलि देकर सात्विक प्रेम और समर्पण के मार्ग पर अग्रसर होता है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
