क्या है उदयपुर के एकलिंगजी मंदिर का इतिहास? जानिए 8वीं सदी से अब तक की ऐतिहासिक यात्रा
उदयपुर के कैलाशपुरी गांव में स्थित ऐतिहासिक एकलिंगजी मंदिर मेवाड़ के कुलदेवता का मुख्य केंद्र है। 8वीं सदी में बप्पा रावल ने स्थापित इस मंदिर का पुनर्निर्माण हामिर सिंह, राणा कुम्भा और राणा रायमल ने कराया। यह मंदिर धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का प्रतीक है।

उदयपुर जिले के कैलाशपुरी गांव में स्थित एकलिंगजी मंदिर राजस्थान की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण केंद्र है। यह मंदिर परिसर मेवाड़ की प्राचीन राजधानी नागड़ा के निकट स्थित है और मान्यता है कि एकलिंगजी ही मेवाड़ के राजघराने के कुलदेवता हैं। महाराणा परंपरा के अनुसार, महाराणा स्वयं एकलिंगजी के दीवान यानी मंत्री के रूप में कार्य करते हैं, जो इस मंदिर और उसके धार्मिक महत्व की गरिमा को दर्शाता है।
ऐतिहासिक दस्तावेज़ एकलिंगा पुराण (15वीं सदी) के अनुसार, मूल मंदिर की स्थापना 8वीं सदी में बप्पा रावल ने की थी। हालांकि, दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों के दौरान मंदिर और मूर्ति दोनों नष्ट हो गए। वर्तमान मंदिर में स्थापित सबसे पुरानी मूर्ति हामिर सिंह (14वीं सदी) ने स्थापित की थी, जिन्होंने मंदिर का व्यापक नवीनीकरण भी कराया। इसके बाद 15वीं सदी में राणा कुम्भा ने मंदिर का पुनर्निर्माण किया और इसके साथ ही विष्णु मंदिर का निर्माण भी किया। उनके 1460 के शिलालेख में उन्हें “एकलिंगजी का व्यक्तिगत सेवक” बताया गया है।
15वीं सदी के उत्तरार्ध में मालवा सल्तनत के घियाथ शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर एकलिंगजी मंदिर को विध्वंस किया। इसके उत्तराधिकारी राणा रायमल (1473–1509) ने घियाथ शाह को हराकर बंदी बना लिया और फिर उनके मुक्तिपत्र के लिए प्राप्त रेमिशन से मंदिर का अंतिम प्रमुख पुनर्निर्माण कराया। इसी दौरान वर्तमान मुख्य मंदिर की मूर्ति स्थापित की गई।
मंदिर की प्रारंभिक परंपरा संभवतः पाशुपत संप्रदाय से जुड़ी रही, और बाद में इसे नाथ संप्रदाय के अधीन रखा गया। 16वीं सदी में यह मंदिर मेवाड़ के राजवंश के संरक्षण में पूरी तरह विकसित हुआ और धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र के रूप में अपनी महत्ता को बनाए रखा।
आज एकलिंगजी मंदिर न केवल श्रद्धालुओं के लिए तीर्थ स्थल है, बल्कि यह मेवाड़ की धार्मिक परंपराओं, स्थापत्य कला और ऐतिहासिक संघर्षों का जीवंत साक्ष्य भी है। मंदिर परिसर में प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु आते हैं, जो इसकी आध्यात्मिक महत्ता और ऐतिहासिक गौरव को बनाए रखते हैं।
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Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
