वट सावित्री व्रत पर नाक तक लंबा सिंदूर लगाने की परंपरा उत्तर भारत में सुहाग, स्त्री शक्ति और वैवाहिक समर्पण का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है। सावित्री-सत्यवान की कथा, देवी पार्वती की मान्यताओं और हनुमान-सीता की पौराणिक कथा से जुड़ी यह परंपरा आज भी बिहार, यूपी और मिथिला क्षेत्रों में गहरी आस्था के साथ निभाई जाती है।

उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत के दौरान महिलाओं द्वारा नाक तक लंबा सिंदूर लगाने की परंपरा केवल श्रृंगार भर नहीं मानी जाती, बल्कि यह सुहाग, समर्पण, स्त्री शक्ति और धार्मिक आस्था का गहरा प्रतीक मानी जाती है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मिथिला और कुछ बंगाली परंपराओं में यह रीति आज भी विशेष श्रद्धा और सामाजिक महत्व के साथ निभाई जाती है। त्योहारों, विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान माथे से लेकर नाक की ओर तक लगाया गया गाढ़ा सिंदूर विवाहित स्त्री के अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु की कामना का प्रतीक माना जाता है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार सिंदूर विवाहित महिला के “सुहाग” का सबसे महत्वपूर्ण चिन्ह माना जाता है। पारंपरिक विश्वास है कि जितना प्रमुख और लंबा सिंदूर लगाया जाता है, उतना ही वह पति के प्रति प्रेम, समर्पण और वैवाहिक निष्ठा को दर्शाता है। वट सावित्री व्रत के अवसर पर यह परंपरा और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यह व्रत पौराणिक पात्र सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प, तप और बुद्धिमत्ता के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इसी कारण विवाहित महिलाएं इस दिन व्रत रखकर पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।

लंबे सिंदूर की परंपरा को देवी Parvati से भी जोड़ा जाता है, जिन्हें आदर्श सुहागन और स्त्री शक्ति का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महिलाएं सिंदूर लगाकर देवी पार्वती से वैवाहिक सुख, समृद्धि और परिवार की रक्षा का आशीर्वाद मांगती हैं। कई समुदायों में माथे पर अधिक विस्तृत सिंदूर को सौभाग्य और समृद्धि का संकेत माना जाता है।

इस परंपरा से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा हनुमान, सीता और राम से संबंधित मानी जाती है। धार्मिक कथाओं के अनुसार हनुमान ने एक बार सीता को मांग में सिंदूर लगाते देखा और उसका कारण पूछा। सीता ने बताया कि वह भगवान राम की लंबी आयु और सुरक्षा के लिए सिंदूर लगाती हैं। यह सुनकर हनुमान ने अपने आराध्य राम के प्रति प्रेम और भक्ति में पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया। माना जाता है कि इस घटना के बाद सिंदूर प्रेम, सुरक्षा, त्याग और अटूट निष्ठा का प्रतीक बन गया।

आध्यात्मिक दृष्टि से भी माथे और भौंहों के बीच का क्षेत्र विशेष महत्व रखता है। योग और आयुर्वेद परंपराओं में इसे “आज्ञा चक्र” या ऊर्जा केंद्र माना गया है। पारंपरिक मान्यता है कि इस क्षेत्र में सिंदूर लगाने से मानसिक एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। पुराने समय में सिंदूर को हल्दी, चूना और कुछ पारंपरिक तत्वों से तैयार किया जाता था, जिनके बारे में यह विश्वास था कि वे मानसिक शांति और संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं, हालांकि आधुनिक विज्ञान इन दावों की पुष्टि नहीं करता।

उत्तर भारत के कई हिस्सों में नाक तक लंबा सिंदूर लगाना केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक परंपरा का भी हिस्सा बन चुका है। विशेष रूप से वट सावित्री, करवा चौथ, विवाह और अन्य मांगलिक अवसरों पर यह परंपरा महिलाओं के श्रृंगार और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। बदलते समय के बावजूद यह परंपरा आज भी भारतीय समाज में वैवाहिक विश्वास, सांस्कृतिक विरासत और स्त्री शक्ति के प्रतीक के रूप में जीवित है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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