जब भक्त की पुकार पर दौड़े चले आए नारायण: राजा मान्धाता और वरुथिनी एकादशी की हृदयस्पर्शी कथा
वैशाख मास की वरुथिनी एकादशी पर भगवान विष्णु की आराधना से पापों का नाश होता है। जानिए इस पावन व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पौराणिक महत्व।

भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी शेषनाग पर विराजमान होकर समुद्र के मध्य दर्शन देते हुए।
वैशाख मास के पावन व्रत का आध्यात्मिक महत्व, पूजा विधि और राजा मान्धाता की पौराणिक गाथा
सनातन धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक परंपराओं में एकादशी व्रत का स्थान अत्यंत उच्च और फलदायी माना गया है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली वरुथिनी एकादशी का महत्व शास्त्रों में हजारों वर्षों की तपस्या के समान बताया गया है। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि मानवीय चेतना को शुद्ध करने और जीवन के संचित पापों के शमन का एक विशेष अवसर लेकर आई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 'वरुथिनी' शब्द का अर्थ कवच होता है, जो जातक को अकाल मृत्यु, शारीरिक रोगों और सांसारिक दुखों से सुरक्षा प्रदान करता है। धार्मिक विद्वानों का मत है कि जो श्रद्धापूर्वक इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना करता है, उसे न केवल इस लोक में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है, बल्कि मृत्युोपरांत मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
इस वर्ष वरुथिनी एकादशी की तिथि के निर्धारण में ज्योतिषीय गणनाओं का विशेष महत्व है। वैदिक पंचांग के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि एकादशी तिथि का प्रारंभ 13 अप्रैल 2026 को तड़के 01:17 बजे हो चुका था, जिसका समापन 14 अप्रैल की मध्यरात्रि के पश्चात 01:08 बजे होगा। उदयातिथि की शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, व्रत का अनुष्ठान 13 अप्रैल को ही किया जा रहा है। व्रत के पारण का समय 14 अप्रैल की सुबह 06:54 बजे से 08:31 बजे के मध्य निर्धारित है। यह कालखंड व्रत की पूर्णता और फल प्राप्ति के लिए सर्वाधिक शुभ माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि एकादशी के नियमों का पालन दशमी की रात्रि से ही आरंभ हो जाता है, जिसमें सात्विकता और मानसिक संयम पर विशेष बल दिया जाता है।
वरुथिनी एकादशी की पूजा पद्धति में शुचिता और भक्ति का संगम अनिवार्य है। ब्रह्म मुहूर्त में जागरण के पश्चात गंगाजल युक्त जल से स्नान कर संकल्प धारण करना इस प्रक्रिया का प्रथम सोपान है। भगवान विष्णु की प्रतिमा को पीले वस्त्र, तुलसी दल और पंचामृत से सुशोभित करना भक्ति की गहराई को दर्शाता है। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" जैसे सिद्ध मंत्रों का जाप करते हुए भक्त दिनभर निराहार या फलाहार रहकर अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। शाम के समय दीपदान और एकादशी महात्म्य की कथा का श्रवण करना अनंत गुना पुण्य प्रदान करता है। इस व्रत का मूल दर्शन केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि ईश्वर के सानिध्य में रहकर स्वयं के अंतर्मन को परिष्कृत करना है।
इस एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा राजा मान्धाता के जीवन की एक विरल घटना पर आधारित है। कथा के अनुसार, जब राजा मान्धाता वन में गहन तपस्या में लीन थे, तब एक हिंसक भालू ने उनके पैरों को चबाना प्रारंभ कर दिया था। असहनीय पीड़ा के बावजूद राजा ने क्रोध करने के स्थान पर नारायण की शरण ली। भक्त की करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और अपने सुदर्शन चक्र से उस भालू का वध कर दिया। राजा के क्षतिग्रस्त शरीर को पुनः स्वस्थ और तेजस्वी बनाने के लिए स्वयं श्रीहरि ने उन्हें वरुथिनी एकादशी का व्रत करने का निर्देश दिया। राजा के श्रद्धापूर्वक व्रत करने के पश्चात उनका शरीर पूर्ववत दिव्य हो गया। यह कथा इस बात का प्रमाण है कि अटूट विश्वास और भक्ति के सम्मुख बड़ी से बड़ी शारीरिक और मानसिक विपत्तियां भी नतमस्तक हो जाती हैं।
वरुथिनी एकादशी का यह अनुष्ठान केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को आत्म-निरीक्षण और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। आधुनिक युग की भागदौड़ भरी जिंदगी में इस प्रकार के व्रत मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं। शास्त्रों की यह उद्घोषणा कि इस व्रत का पुण्य कन्यादान के फल के समान है, इसकी महत्ता को और अधिक बढ़ा देती है। अतः 13 अप्रैल को आयोजित यह पावन व्रत समस्त श्रद्धालुओं के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा, जो उन्हें दुर्भाग्य के अंधकार से निकालकर सौभाग्य के प्रकाश की ओर ले जाने की क्षमता रखता है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
