नई दिल्ली: जब सूर्य की किरणें अपनी दिशा बदलकर धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करती हैं, तो केवल ऋतु परिवर्तन ही नहीं होता, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना में एक नए अध्याय का सूत्रपात होता है। मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का वह आध्यात्मिक प्रस्थान बिंदु है, जिसे 'उत्तरायण' के नाम से जाना जाता है। देश के कोने-कोने में गूँजते शंखनाद और पवित्र नदियों के तटों पर उमड़ती श्रद्धा की लहरें इस बात की गवाह हैं कि यह दिन भारतीय संस्कृति में मोक्ष और समृद्धि का द्वार माना जाता है। इस वर्ष भी देश भर में इस उत्सव की धूम है, जहाँ लाखों श्रद्धालु अपनी आस्था की डुबकी लगाकर जीवन के नए संकल्पों को जीवंत कर रहे हैं।

इस महापर्व के धार्मिक और पौराणिक महत्व को रेखांकित करते हुए प्रसिद्ध विद्वान आचार्य पंडित रमाकांत शास्त्री ने बताया कि मकर संक्रांति का दिन महाभारत काल से ही अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भीष्म पितामह ने स्वेच्छा से अपने प्राण त्यागने के लिए इसी सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी, क्योंकि मान्यता है कि इस काल में देह त्यागने वाले जीव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। वहीं, ज्योतिषाचार्य डॉ. सतीश चंद्र मिश्र का कहना है कि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश खगोलीय दृष्टि से भी अत्यंत शुभ है, क्योंकि इसी दिन से दिन बड़े होने लगते हैं और रात्रि छोटी, जो नकारात्मकता के अंत और सकारात्मक ऊर्जा के उदय का प्रतीक है।

रीति-रिवाजों की बात करें तो मकर संक्रांति पर दान का विशेष महत्व है। उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक केंद्रों पर व्यवस्था संभाल रहे प्रशासन के अधिकारियों, जैसे जिलाधिकारी संजीव कुमार और पुलिस अधीक्षक राजेश सिंह ने बताया कि प्रयागराज, वाराणसी और हरिद्वार जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं ताकि श्रद्धालु निर्बाध रूप से गंगा स्नान कर सकें। इस दिन खिचड़ी का भोग लगाना और तिल-गुड़ के सेवन का वैज्ञानिक महत्व भी है। पोषण विशेषज्ञ डॉ. अंजलि खन्ना के अनुसार, कड़कड़ाती ठंड में तिल और गुड़ शरीर को आवश्यक ऊष्मा प्रदान करते हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाजसेविका सरिता देवी और स्थानीय आयोजक विनय प्रताप सिंह ने सामुदायिक भोज का आयोजन किया है, जहाँ 'खिचड़ी उत्सव' के माध्यम से सामाजिक समरसता का संदेश दिया जा रहा है।

कानूनी और आधिकारिक दृष्टिकोण से देखें तो इस महापर्व के दौरान होने वाली विशाल भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न राज्य सरकारों ने 'मेला प्रबंधन अधिनियम' के तहत कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। नदियों की स्वच्छता बनाए रखने के लिए नेशनल क्लीन गंगा मिशन के समन्वयक आलोक प्रधान ने नागरिकों से अपील की है कि वे पूजन सामग्री को सीधे जल में प्रवाहित न करें। इसके साथ ही, पतंगबाजी के दौरान उपयोग होने वाले घातक 'चीनी मांझे' पर प्रशासन ने सख्त प्रतिबंध लगाया है, जिसकी पुष्टि करते हुए नगर निगम आयुक्त गौरव शर्मा ने बताया कि उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की जाएगी ताकि पक्षियों और राहगीरों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

मकर संक्रांति का यह उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मनुष्य के अटूट संबंध का उत्सव है। फसल कटाई के इस मौसम में किसान अपनी मेहनत का फल ईश्वर को समर्पित करते हैं, जो इसे एक आर्थिक और कृषि प्रधान उत्सव भी बनाता है। अंततः, यह पर्व हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य अपनी दिशा बदलकर जग को प्रकाशित करता है, हमें भी अपने भीतर की जड़ता को त्यागकर कर्म पथ पर अग्रसर होना चाहिए। मकर संक्रांति की यह पावन बेला आधुनिक समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने और मानवता के कल्याण हेतु संकल्पित होने का एक स्वर्णिम अवसर प्रदान करती है।

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