भारतीय मंदिरों, संग्रहालयों और विश्वभर की कला दीर्घाओं में जब भी भगवान शिव के नटराज रूप की प्रतिमा दिखाई देती है, तो एक दृश्य समान रूप से उभरता है शिव के चरणों के नीचे दबा एक छोटा-सा बौना पुरुष। यही आकृति है अपस्मार, जो केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन की गहरी चेतावनी और संदेश का प्रतीक है हिंदू पुराणों और शैव परंपरा के अनुसार, अपस्मार एक असुर है, जो अज्ञान, अहंकार, विस्मृति और मानसिक अंधकार का प्रतिनिधित्व करता है।

कथाओं में वर्णन मिलता है कि अपस्मार को ऐसे वरदान प्राप्त थे, जिनके कारण वह स्वयं को सर्वज्ञ और अजेय मानने लगा। उसका यह अहंकार देवताओं और ऋषियों के लिए चिंता का विषय बन गया, क्योंकि वह ज्ञान और चेतना को नष्ट करने का प्रतीक बन चुका था। अपस्मार की उत्पत्ति को किसी एक ग्रंथ में सीमित नहीं किया गया, बल्कि उसे मानवीय दुर्बलताओं की साकार अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया है। यही कारण है कि वह किसी राजवंश या युद्ध कथा से नहीं, बल्कि दार्शनिक संघर्ष से जुड़ा हुआ है।

संस्कृत में “अपस्मार” शब्द दो भागों से मिलकर बना है, “अप” अर्थात् ह्रास या क्षय, और “स्मार” अर्थात् स्मृति। इस प्रकार अपस्मार का शाब्दिक अर्थ है स्मृति या चेतना का लोप। प्राचीन आयुर्वेदिक और चिकित्सा ग्रंथों में यह शब्द मिर्गी जैसे मानसिक रोगों के लिए भी प्रयुक्त हुआ है, जो यह दर्शाता है कि प्राचीन भारत में मानसिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक चेतना के बीच गहरा संबंध समझा जाता था।

नटराज रूप में भगवान शिव को ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में दर्शाया जाता है, जो सृष्टि, संरक्षण और संहार के चक्र को संचालित करते हैं। इस रूप में अपस्मार को शिव के पैरों के नीचे दिखाया जाना केवल दृश्यात्मक तत्व नहीं, बल्कि गहन प्रतीकात्मक अर्थ रखता है। अपस्मार को मारा नहीं गया, बल्कि दबाया गया। यह दर्शाता है कि अज्ञान को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे नियंत्रित और अधीन किया जा सकता है। यदि अज्ञान पूर्णतः समाप्त हो जाए, तो ज्ञान की पहचान भी समाप्त हो जाएगी। यही संतुलन भारतीय दर्शन का मूल है।

चोल काल से लेकर आधुनिक युग तक, दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्तियों में अपस्मार की आकृति अनिवार्य रूप से शामिल रही है। उसकी मुड़ी हुई देह, भयभीत मुख और असहाय मुद्रा यह स्पष्ट करती है कि अज्ञान कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः वह चेतना के आगे झुकता है। यही कारण है कि नटराज की मूर्ति केवल धार्मिक नहीं, बल्कि दार्शनिक और सांस्कृतिक दस्तावेज भी मानी जाती है। अपस्मार आज भी प्रासंगिक है। वह आधुनिक समाज के अहंकार, अंधविश्वास और बौद्धिक जड़ता का प्रतीक बन चुका है। नटराज के चरणों के नीचे उसकी उपस्थिति यह संदेश देती है कि ज्ञान, विवेक और आत्मबोध के बिना सभ्यता आगे नहीं बढ़ सकती।



Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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