हिंदू धर्म कैलेंडर के अनुसार, आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है, क्योंकि इस पावन दिन पर दो प्रमुख पर्व, शरद पूर्णिमा और वाल्मीकि जयंती, एक साथ मनाए जाते हैं। हालांकि, वर्ष 2026 में इन दोनों त्योहारों की सही तारीख को लेकर श्रद्धालुओं के बीच काफी असमंजस की स्थिति बन गई है। इसका मुख्य कारण यह है कि पूर्णिमा की तिथि दो दिनों, 25 और 26 अक्टूबर, तक व्याप्त रह रही है। चूंकि अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तिथियों की गणना के नियम अलग-अलग होते हैं, इसलिए लोग दुविधा में हैं कि कौन सा त्योहार किस दिन मनाना शास्त्र सम्मत और सही होगा।

शास्त्रों और पंचांग की गणनाओं के आधार पर, इस दुविधा को दूर करने के लिए विशेष नियम दिए गए हैं। पंडित राकेश झा के अनुसार, वर्ष 2026 में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का आरंभ 25 अक्टूबर, रविवार को सुबह 11 बजकर 57 मिनट पर हो जाएगा। इसके बाद, यह पावन तिथि अगले दिन यानी 26 अक्टूबर, सोमवार को सुबह 9 बजकर 42 मिनट तक बनी रहेगी। हिंदू धर्म में अलग-अलग त्योहारों के लिए तिथियों की गणना के नियम अलग हैं, इसी वजह से दोनों पर्व अलग-अलग दिनों पर पड़ रहे हैं।

शरद पूर्णिमा के त्योहार के लिए शास्त्रों में यह विधान है कि जिस दिन पूर्णिमा तिथि प्रदोष काल और निशीथ काल, यानी रात के समय व्याप्त हो, उसी दिन इसका व्रत और पूजा की जानी चाहिए। शरद पूर्णिमा की मुख्य परंपरा रात में चंद्रमा की किरणों के नीचे खीर रखने की होती है, जिसके लिए रात के समय पूर्णिमा तिथि का होना अनिवार्य है। पंचांग की गणना के अनुसार, रात के समय पूर्णिमा तिथि का यह संयोग 25 अक्टूबर, रविवार को बन रहा है। इसलिए, वर्ष 2026 में शरद पूर्णिमा का व्रत और उससे जुड़े सभी धार्मिक अनुष्ठान 25 अक्टूबर को ही संपन्न किए जाएंगे।

दूसरी ओर, महर्षि वाल्मीकि की जयंती मनाने के लिए विधान कुछ अलग है। शास्त्र सम्मत नियमों के अनुसार, वाल्मीकि जयंती उस दिन मनाई जाती है जब सूर्योदय के समय या सूर्योदय से ठीक पूर्व पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो, जिसे उदया तिथि भी कहा जाता है। चूंकि 26 अक्टूबर, सोमवार को सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए उदया तिथि की गणना के अनुसार इसी दिन वाल्मीकि जयंती का पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। इसके साथ ही, पूर्णिमा तिथि का पावन स्नान, दान और अन्य धर्म-कर्म के कार्य भी 26 अक्टूबर को करना ही उचित माना गया है।

शरद पूर्णिमा का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत गहरा महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस विशेष रात चंद्रमा अपनी सभी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी चांदनी से साक्षात् अमृत की वर्षा होती है। इसी विश्वास के चलते लोग रात भर खुले आसमान के नीचे खीर रखते हैं, ताकि उसमें अमृत का अंश समा जाए और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सके। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, शरद पूर्णिमा की तिथि पर ही समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। यह भी माना जाता है कि इस रात मां लक्ष्मी धरती पर विचरण करने आती हैं। इसलिए, श्रद्धालु अपने घरों में लक्ष्मी-नारायण की विधि-विधान से पूजा करते हैं ताकि उन्हें भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त हो सके।

इसी प्रकार, वाल्मीकि जयंती का भी अत्यंत महत्व है, क्योंकि यह दिन महान महर्षि वाल्मीकि के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, वाल्मीकिजी भगवान श्री राम के परम भक्त थे और उन्होंने ही रामायण महाकाव्य की रचना की थी। वाल्मीकि समुदाय के लिए यह तिथि सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। वे महर्षि वाल्मीकि को भगवान का स्वरूप मानते हैं और इस दिन उनका पूर्ण विधि-विधान से पूजन और अर्चन करते हैं। इस विशेष अवसर पर उनके मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है और रामायण की चौपाइयों का पाठ किया जाता है।

इस वर्ष 26 अक्टूबर को जब वाल्मीकि जयंती मनाई जाएगी, उस दिन एक और विशेष संयोग बन रहा है। उस दिन पंचांग के अनुसार अश्विनी नक्षत्र और मेष राशि में चंद्रमा का संयोग रहेगा। इसके साथ ही, इसी दिन से अत्यंत पवित्र कार्तिक मास का भी आरंभ हो जाएगा। जो श्रद्धालु पूरे कार्तिक मास में व्रत, नियम और संयम का पालन करते हैं और इस माह लगने वाले मेलों का हिस्सा बनते हैं, उनके लिए इन सब कार्यों की शुरुआत भी इसी दिन से होगी।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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