शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी में ऐसे रखें खीर का प्रसाद, जानिए इस पावन रात पर क्या करें और क्या नहीं?
शरद पूर्णिमा पर माता लक्ष्मी की पूजा, चंद्र दर्शन और खीर का प्रसाद बनाते समय ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण नियम और धार्मिक मान्यताएं।

आश्विन मास की शरद पूर्णिमा तिथि की रात को आसमान में चमकता हुआ पूर्ण चंद्रमा।
हिंदू सनातन धर्म में आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व माना गया है। इस पूर्णिमा को पूरे वर्ष भर की सभी पूर्णिमा तिथियों में से सबसे खास और पवित्र स्थान दिया गया है। आश्विन मास में पड़ने वाली इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के अलावा 'कोजागरी पूर्णिमा' के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा का पावन व्रत और उत्सव 25 अक्टूबर, रविवार के दिन रखा जाएगा। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होकर उदित होता है। ऐसा माना जाता है कि इस रात को आकाश से चंद्रमा की शीतल किरणों के रूप में अमृत की वर्षा होती है। इसके साथ ही, यह भी मान्यता है कि इस खास पूर्णिमा की रात को धन और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी स्वयं अपने वाहन गरुड़ पर भगवान विष्णु यानी लक्ष्मीनारायण के साथ पृथ्वी लोक पर भ्रमण करने के लिए आती हैं। इसी वजह से शरद पूर्णिमा की रात को माता लक्ष्मी की विशेष पूजा करने, चंद्रमा के दर्शन करने और दूध-चावल से बनी खीर का प्रसाद तैयार करने का विधान है।
शरद पूर्णिमा के दिन पूजा-पाठ और व्रत करने के साथ-साथ कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक नियमों का पालन करना भी बहुत आवश्यक माना गया है। ऐसा माना जाता है कि यदि जाने-अनजाने में कोई भूल या गलती हो जाए, तो उससे पूजा या व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता और वह अधूरा रह सकता है। इसी संदर्भ में ज्योतिष एक्सपर्ट पिनाकी मिश्रा ने शरद पूर्णिमा के अवसर पर किए जाने वाले जरूरी कार्यों और उन बातों के बारे में विस्तार से जानकारी दी है, जिन्हें करने से इस दिन बचना चाहिए।
सबसे पहले बात करते हैं कि शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं को कौन-कौन से कार्य करने चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इस रात माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर पृथ्वी पर आते हैं। इसलिए शरद पूर्णिमा की शाम को पूरी निष्ठा और श्रद्धाभाव के साथ भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। ज्योतिष एक्सपर्ट पिनाकी मिश्रा के अनुसार, पूर्णिमा की शाम को घर और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ-स्वच्छ कर लेना चाहिए। इसके बाद देवी लक्ष्मी और विष्णु जी की पूजा करके उन्हें फूल, फल, मिठाई और अपनी श्रद्धा के अनुसार नैवेद्य अर्पित करना चाहिए। ज्योतिषीय और धार्मिक नजरिए से इस रात को जीवन में समृद्धि, शुभता और आर्थिक उन्नति हासिल करने के लिए बहुत फलदायी माना गया है।
शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की पूजा और दर्शन का भी अपना एक बड़ा महत्व है। चूंकि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृत बरसता है, इसलिए चंद्र दर्शन को बहुत शुभ माना गया है। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मनुष्य के मन, भावनाओं और मानसिक संतुलन का मुख्य कारक माना गया है। शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा के दर्शन करने के बाद अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार जल या अर्घ्य अर्पित करना चाहिए। अर्घ्य देते समय मन ही मन अपने जीवन में मानसिक शांति, भावनाओं में संतुलन और पूरे परिवार के कल्याण के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।
इसके अलावा, शरद पूर्णिमा पर दूध और चावल का उपयोग करके खीर बनाने की एक प्राचीन और अनिवार्य परंपरा रही है। देश के कई हिस्सों में इस दिन रात के समय बनी हुई खीर को खुले आसमान के नीचे चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है। इस दौरान खीर की स्वच्छता और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। खीर के बर्तन को किसी बारीक छलनी या सूती के साफ कपड़े से अच्छी तरह ढककर रखना चाहिए। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि रात भर चंद्रमा के प्रकाश में रहने से चांद की किरणों के साथ अमृत का अंश खीर में समाहित हो जाता है। अगले दिन सुबह इस खीर को सबसे पहले माता लक्ष्मी या अपने आराध्य देव को अर्पित किया जाता है और उसके बाद पूरे परिवार के सदस्यों के बीच प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। माना जाता है कि इस प्रसाद का सेवन करने से जीवन में अत्यंत शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
जीवन में चंद्रमा की अनुकूलता बनाए रखने और मन की शांति के लिए शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा के मंत्रों का जप करना भी बहुत लाभकारी बताया गया है। इस दिन श्रद्धालु 'ओम सोम सोमाय नमः' मंत्र का कम से कम 108 बार जप कर सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्रमा के इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति का मन शांत होता है और उसकी भावनात्मक स्थिति संतुलित बनी रहती है। हालांकि, किसी भी उपाय को करते समय मन में सच्ची श्रद्धा और सही विधि का होना अनिवार्य माना गया है।
आश्विन शुक्ल पूर्णिमा के अवसर पर दान-पुण्य करने का भी बहुत बड़ा महात्म्य पुराणों में बताया गया है। इस दिन हर व्यक्ति को अपने सामर्थ्य और क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद, गरीब या असहाय व्यक्ति को भोजन, वस्त्र, चावल या अन्य कोई भी उपयोगी वस्तु दान में देनी चाहिए। हमारी धार्मिक परंपराओं में दान को हमेशा से पुण्य कार्य, निस्वार्थ सेवा और उदारता के प्रतीक के रूप में देखा गया है। पूर्णिमा पर किया गया दान अत्यंत पुण्यकारी होता है, लेकिन दान करते समय दिखावे के बजाय मन में सच्ची श्रद्धा और सेवा का भाव होना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
दूसरी तरफ, शरद पूर्णिमा के दिन कुछ ऐसी गलतियां और काम भी हैं, जिनसे हर व्यक्ति को पूरी तरह बचना चाहिए। चूंकि ज्योतिष में चंद्रमा को मन और भावनाओं का स्वामी माना गया है, इसलिए शरद पूर्णिमा के दिन मानसिक शांति बनाए रखना सबसे जरूरी है। ज्योतिष एक्सपर्ट पिनाकी मिश्रा सलाह देते हैं कि इस दिन भूलकर भी किसी के लिए कटु वाणी या कड़वे शब्दों का इस्तेमाल न करें। परिवार के भीतर किसी भी प्रकार के बेवजह के झगड़े या विवाद से बचें। इसके अलावा, किसी भी गरीब या असहाय व्यक्ति का अपमान गलती से भी न करें। इस दिन किया गया गुस्सा या विवाद जीवन में नकारात्मक और प्रतिकूल प्रभाव ला सकता है।
खीर को चंद्रमा के प्रकाश में रखते समय भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। खीर को कभी भी पूरी तरह से खुला या असुरक्षित अवस्था में रात भर नहीं छोड़ना चाहिए। उसे हमेशा किसी साफ छलनी या कपड़े से ढककर ही सुरक्षित स्थान पर रखें। इसके अलावा, दूध से बने खाद्य पदार्थों को बहुत लंबे समय तक सामान्य तापमान पर खुला छोड़ना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सही नहीं माना जाता है।
एक और मुख्य बात यह है कि कई लोग शरद पूर्णिमा पर चंद्र दोष से मुक्ति पाने के लिए तरह-तरह के ज्योतिषीय उपाय करने लगते हैं। लेकिन ज्योतिषीय नियमों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा की वास्तविक स्थिति का आकलन उसकी जन्मकुंडली, राशि, लग्न भाव और अन्य ग्रहों के साथ उसके संबंध को देखकर ही किया जा सकता है। इसलिए बिना किसी योग्य और कुशल ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखाए शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा से जुड़ा कोई भी उपाय या टोटका नहीं करना चाहिए। चंद्र दोष का कोई भी निवारण हमेशा किसी विशेषज्ञ ज्योतिषी की उचित सलाह के बाद ही किया जाना चाहिए।
अंत में, शरद पूर्णिमा का व्रत और उपवास रखते समय श्रद्धालुओं को अपनी सेहत और शारीरिक स्थिति की अनदेखी बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। यद्यपि शरद पूर्णिमा का व्रत रखना धार्मिक दृष्टि से बहुत शुभ माना गया है, परंतु यदि कोई व्यक्ति किसी बीमारी से पीड़ित है या उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, तो उसे अपनी शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखकर ही उपवास का निर्णय लेना चाहिए। ईश्वर हमेशा भक्त के मन की सच्ची श्रद्धा और भाव को देखते हैं, न कि शरीर को कष्ट देने को। इसलिए यदि सेहत इजाजत न दे, तो मन में पूरी श्रद्धा रखकर केवल पूजा-पाठ करने से ही ईश्वर की कृपा और शुभ फल की प्राप्ति हो जाती है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
