शरद पूर्णिमा पर बांके बिहारी के दुर्लभ दर्शनों का आखिर क्यों है इंतजार?जानिए इस पावन दिन की महिमा|
शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी साल में एक बार बंसी धारण कर विशेष महारास मुद्रा में भक्तों को दर्शन देते हैं।

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर चांदी के सिंहासन पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य और दुर्लभ महारास दर्शन।
शरद पूर्णिमा का अवसर वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर और वहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन बांके बिहारी जी अपने भक्तों को एक ऐसे स्वरूप में दर्शन देते हैं, जिसका इंतजार पूरे देश के श्रद्धालुओं को साल भर रहता है। साल में केवल एक बार होते हैं ये खास दर्शन|
शरद पूर्णिमा के पावन दिन बांके बिहारी जी साल में सिर्फ एक बार हाथ में बंसी (बांसुरी) धारण कर महारास की मुद्रा में नजर आते हैं। इस अवसर पर ठाकुर जी को सफेद रंग की पोशाक पहनाई जाती है, मोर मुकुट से सजाया जाता है और उनका विशेष सोलह श्रृंगार किया जाता है। इस विशेष दिन भगवान मंदिर के गर्भ गृह से बाहर आते हैं और जगमोहन में बने चांदी के सिंहासन पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। प्रभु के इस मनमोहक और अलौकिक रूप को देखने के लिए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्री कृष्ण ने यमुना तट के पास वंशीवट में गोपियों संग महारास रचाया था। इसी पावन और दिव्य लीला की याद में हर वर्ष बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी का यह अद्भुत श्रृंगार किया जाता है। वर्ष 2026 में शरद पूर्णिमा का यह पर्व 25 अक्टूबर, रविवार के दिन मनाया जाएगा। निधिवन से जुड़ा खास संबंध
बांके बिहारी मंदिर के पास स्थित निधिवन को ठाकुर जी का प्राकट्य स्थल माना जाता है। मान्यता है कि स्वामी हरिदास जी की भक्ति और संगीत की साधना से प्रसन्न होकर बांके बिहारी जी निधिवन में ही प्रकट हुए थे। माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने राधा रानी और गोपियों के साथ निधिवन में दिव्य रासलीला की थी। ऐसी मान्यता भी है कि आज भी रात के समय वहां भगवान की दिव्य लीलाएं होती हैं, इसी कारण शाम ढलते ही निधिवन परिसर को पूरी तरह खाली करा दिया जाता है। चंद्रमा की रोशनी और खीर के भोग की परंपरा
शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर उसे खुले आसमान के नीचे चंद्रमा की रोशनी में रखने की पुरानी परंपरा है। माना जाता है कि इस रात चंद्रमा अपनी पूरी सोलह कलाओं से युक्त होता है और उसकी किरणों से अमृत बरसता है। इस खास दिन पर बांके बिहारी मंदिर में भी ठाकुर जी को विशेष रूप से खीर और चंद्रकला का भोग अर्पित किया जाता है। बांके बिहारी जी का यह अनूठा रूप और शरद पूर्णिमा की यह पावन परंपरा वृंदावन के माहौल को भक्ति और आनंद से सराबोर कर देती है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
