धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए Supreme Court of India ने स्पष्ट किया है कि आस्था के नाम पर सार्वजनिक सड़कों को बाधित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि धर्म का पालन हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इसे इस तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता जिससे आम जनजीवन या यातायात प्रभावित हो।

यह टिप्पणी उस समय आई जब कोर्ट सबरीमाला केस की सुनवाई कर रहा था, जिसका यह नौवां दिन था। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि यदि किसी धार्मिक गतिविधि के कारण सार्वजनिक व्यवस्था या किसी अन्य “सेक्युलर गतिविधि” पर असर पड़ता है, तो राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वही गतिविधियाँ संवैधानिक संरक्षण प्राप्त कर सकती हैं जो वास्तव में धार्मिक प्रकृति की हों, न कि वे जो सार्वजनिक जीवन में अव्यवस्था पैदा करें।

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि धार्मिक संस्थाओं और प्रथाओं को पूर्ण स्वायत्तता नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब उनका प्रभाव व्यापक समाज पर पड़ता हो। अदालत के अनुसार, धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित के बीच एक संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है, ताकि किसी भी प्रकार की अराजकता से बचा जा सके।

यह पूरा विवाद सबरीमाला मंदिर से जुड़ा है, जो केरल में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल है और भगवान अय्यप्पा को समर्पित है। इस मंदिर की विशेषता यह रही है कि यहां आने वाले श्रद्धालु 41 दिनों का कठोर व्रत रखते हैं और सांसारिक सुखों का त्याग करते हैं। लंबे समय तक यह परंपरा रही कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी, क्योंकि भगवान अय्यप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है।

इस परंपरा को 2006 में चुनौती दी गई, जब एक याचिका दायर कर इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन बताया गया। इसके बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इस प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने कहा कि यह प्रथा न केवल महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करती है, बल्कि यह “आवश्यक धार्मिक प्रथा” भी नहीं है।

हालांकि इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक विरोध हुआ और 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने मूल फैसले को रद्द नहीं किया, लेकिन इस मुद्दे से जुड़े व्यापक संवैधानिक सवालों को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया। कोर्ट ने माना कि यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विभिन्न धर्मों और प्रथाओं पर लागू हो सकता है।

वर्तमान में नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें यह तय किया जा रहा है कि “आवश्यक धार्मिक प्रथा” क्या होती है, अदालत को धार्मिक मामलों में कितनी दखल देने का अधिकार है, और धार्मिक स्वतंत्रता तथा मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। इस दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि धार्मिक संस्थाएं कानून से ऊपर नहीं हैं और उन्हें भी संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही कार्य करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट की यह ताजा टिप्पणी केवल सबरीमाला विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में धार्मिक गतिविधियों के स्वरूप और उनकी सीमाओं को लेकर एक व्यापक संदेश देती है। यह स्पष्ट संकेत है कि आस्था का सम्मान किया जाएगा, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों के अधिकारों की कीमत पर नहीं। आने वाले समय में इस मामले का अंतिम निर्णय देश में धर्म और कानून के संबंधों को नई दिशा दे सकता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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