भारत की सर्वोच्च अदालत के गलियारों में इन दिनों एक ऐसी कानूनी बहस गूँज रही है, जो न केवल धर्म और आस्था से जुड़ी है, बल्कि आधुनिक भारत में संवैधानिक नैतिकता और व्यक्तिगत गरिमा की नई परिभाषा गढ़ने की क्षमता रखती है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर उठा विवाद अब केवल एक मंदिर की परंपरा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह केंद्र सरकार की दलीलों और न्यायपालिका की सख्त टिप्पणियों के बीच एक बड़े वैचारिक टकराव का रूप ले चुका है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि आस्था एक बेहद निजी और संवेदनशील विषय है, जिसमें अदालत को हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।

इस ऐतिहासिक मामले की सुनवाई के दौरान तब माहौल और भी गंभीर हो गया जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक बेहद मानवीय और तार्किक सवाल खड़ा किया। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों के बीच टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी महिला को महीने के तीन दिन 'अछूत' नहीं माना जा सकता, जबकि चौथे दिन वही महिला अछूत नहीं रहती। यह टिप्पणी उस वक्त आई जब केंद्र सरकार ने 2018 के ऐतिहासिक फैसले में दी गई 'अस्पृश्यता' (अनुच्छेद 17) की व्याख्या पर आपत्ति जताई थी। जस्टिस नागरत्ना ने एक महिला के दृष्टिकोण को सामने रखते हुए पूछा कि क्या जैविक प्रक्रियाओं के आधार पर किसी को अछूत ठहराना तर्कसंगत है?

केंद्र सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन टिप्पणियों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने दलील दी कि सबरीमाला में प्रवेश पर रोक को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 यानी छुआछूत के उन्मूलन से जोड़ना अनुचित है। सरकार का तर्क है कि भारत को पश्चिमी चश्मे से एक पितृसत्तात्मक समाज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मेहता ने कहा कि भारतीय संस्कृति में महिलाओं का स्थान हमेशा से सर्वोच्च रहा है और देश की 'फाउंडिंग मदर्स' ने संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी किसी 'घृणा' या 'अछूत' की भावना से नहीं, बल्कि देवता की विशिष्ट प्रकृति और सदियों पुरानी परंपराओं पर आधारित है।

सरकार ने अदालत को आगाह करते हुए कहा कि धर्म की व्याख्या करना न्यायपालिका के लिए एक जोखिम भरा क्षेत्र हो सकता है। केंद्र के अनुसार, हर धार्मिक परंपरा को आधुनिकता, वैज्ञानिकता या 'तर्कसंगत' होने की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। यदि ऐसा किया गया, तो यह धार्मिक समुदायों की आत्म-समझ पर न्यायिक दर्शन को थोपने जैसा होगा। सॉलिसिटर जनरल ने उदाहरण दिया कि जैसे मस्जिदों या गुरुद्वारों में सिर ढकना एक परंपरा है, वैसे ही सबरीमाला की अपनी मान्यताएं हैं। उन्होंने 'संवैधानिक नैतिकता' शब्द के बढ़ते उपयोग पर भी सवाल उठाए और इसे न्यायिक अतिक्रमण का एक माध्यम बताया।

यह मामला अब केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संविधान पीठ इस संदर्भ में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे व्यापक मुद्दों पर भी विचार कर रही है। अदालत के सामने सात प्रमुख संवैधानिक सवाल हैं, जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 25) और धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों (अनुच्छेद 26) के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। क्या कोई व्यक्ति, जो उस संप्रदाय का हिस्सा नहीं है, जनहित याचिका के जरिए किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है? यह सवाल भविष्य में धर्म और कानून के रिश्तों को तय करेगा।

जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ रही है, यह स्पष्ट हो रहा है कि फैसला जो भी हो, वह भारत के सामाजिक और कानूनी ढांचे पर गहरा प्रभाव डालेगा। एक ओर जहां व्यक्तिगत गरिमा और समानता के संवैधानिक मूल्य हैं, वहीं दूसरी ओर सदियों पुरानी धार्मिक स्वायत्तता और आस्था की रक्षा का तर्क है। इस कानूनी संघर्ष का अंत न केवल सबरीमाला के कपाट महिलाओं के लिए स्थायी रूप से खोलेगा या बंद करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि आधुनिक लोकतंत्र में 'आस्था' और 'कानून' की सीमाएं कहां खत्म होती हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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