इस बार कब है रोहिणी व्रत? 2026 का पूरा शुभ मुहूर्त, ब्रह्म मुहूर्त से पारण तक सबकुछ जानिए
रोहिणी व्रत 2026 सोमवार, 18 मई को श्रद्धा और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी की विशेष पूजा-अर्चना, रोहिणी नक्षत्र का शुभ संयोग, ब्रह्म मुहूर्त, अभिजीत मुहूर्त और व्रत की धार्मिक मान्यताओं के साथ यह दिन आत्मशुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी
आध्यात्मिक साधना, आत्मशुद्धि और पारिवारिक सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाने वाला रोहिणी व्रत वर्ष 2026 में 18 मई, सोमवार को श्रद्धा और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। जैन समुदाय के लिए यह व्रत अत्यंत विशेष माना जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान वासुपूज्य स्वामी, जो जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर हैं, उनकी पूजा-अर्चना का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रोहिणी व्रत का पालन करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, मानसिक स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
रोहिणी व्रत उस समय रखा जाता है जब रोहिणी नक्षत्र का योग बनता है। जैन धर्म के साथ-साथ कुछ हिंदू परंपराओं में भी इस व्रत को विशेष श्रद्धा के साथ किया जाता है। मान्यता है कि यह व्रत आत्म-संयम, तप और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। विशेष रूप से महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, परिवार की खुशहाली और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना के लिए इस व्रत का पालन करती हैं।
रोहिणी व्रत 2026 शुभ तिथि एवं मुहूर्त:
- व्रत तिथि: सोमवार, 18 मई 2026
- रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ: 17 मई 2026, दोपहर 2:32 बजे
- रोहिणी नक्षत्र समाप्त: 18 मई 2026, सुबह 11:32 बजे
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 3:41 बजे से 4:35 बजे तक
- सूर्योदय: सुबह 5:30 बजे
- अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:44 बजे तक
- सूर्यास्त: शाम 7:05 बजे
- पूजा एवं व्रत का शुभ समय: 17 मई दोपहर 2:32 बजे से 18 मई सुबह 11:32 बजे तक
- पारण का समय: रोहिणी नक्षत्र समाप्त होने के बाद मार्गशीर्ष नक्षत्र में
धार्मिक मान्यता के अनुसार जिस दिन सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र पड़ता है, उसी दिन यह व्रत किया जाता है। श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने वाले भक्तों को जीवन के दुखों, कष्टों और दरिद्रता से मुक्ति मिलने की मान्यता है। रोहिणी व्रत का पारण रोहिणी नक्षत्र समाप्त होने के बाद मार्गशीर्ष नक्षत्र में किया जाता है। जैन परंपरा में इस व्रत का पालन लगातार तीन, पाँच या सात वर्षों तक करने की परंपरा भी प्रचलित है।
धार्मिक दृष्टि से इसकी सर्वश्रेष्ठ अवधि पाँच वर्ष और पाँच महीने मानी जाती है, जिसके बाद विधिपूर्वक उद्यापन कर व्रत का समापन किया जाता है। जैन समुदाय में रोहिणी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक अनुशासन, संयम और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक माना जाता है। वर्ष 2026 का यह पावन अवसर श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, साधना और सकारात्मक ऊर्जा का विशेष संदेश लेकर आएगा।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
