पापांकुशा एकादशी व्रत का यह पावन पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 22 अक्टूबर को रखा गया है। धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार इस व्रत का बहुत अधिक महत्व बताया गया है, क्योंकि यह व्रत मनुष्य के अनजाने में किए गए सभी पापों को हरने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, पापांकुशा एकादशी का यह व्रत विजयदशमी के ठीक अगले दिन रखा जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने भी रावण वध के पश्चात ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए इसी एकादशी का व्रत किया था। यद्यपि रावण का आचरण राक्षसों जैसा था, किंतु उसका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था, जिस कारण भगवान राम ने इस दोष के निवारण हेतु विधि-विधान से यह व्रत पूर्ण किया था।

इस व्रत के संदर्भ में विंध्य पर्वत पर रहने वाले एक क्रूर बहेलिए क्रोधन की कथा भी बहुत प्रसिद्ध है। क्रोधन ने अपना संपूर्ण जीवन हिंसा, लूटपाट, मद्यपान और बुरे संग में बिताकर केवल पाप कर्मों में ही व्यतीत किया था। जब उसके जीवन का अंतिम समय निकट आया, तब यमराज के दूत उसे लेने के लिए आ पहुंचे और उसे बताया कि कल उसके जीवन का अंतिम दिन है।

यमराज के दूतों की बात सुनकर वह बहेलिया अत्यंत भयभीत हो गया। डर के मारे वह सीधा महर्षि अंगिरा के आश्रम में जा पहुंचा और उनके चरणों में गिरकर सहायता की गुहार लगाने लगा। बहेलिया ने ऋषि से कहा कि उसने अपने पूरे जीवन में केवल पाप ही किए हैं, इसलिए वे मुझ पर कृपा करें और कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मेरे सारे पाप नष्ट हो जाएं और मुझे मोक्ष की प्राप्ति मिल सके।

बहेलिया की ऐसी दीन प्रार्थना सुनकर महर्षि अंगिरा ने उसे अपने समस्त पापों से छुटकारा पाने के लिए पापांकुशा एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया। महर्षि के कहे अनुसार उस बहेलिए ने पूरी श्रद्धा के साथ यह व्रत और पूजन किया, जिसके प्रभाव से उसके जीवन के सारे पाप नष्ट हो गए। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उसे विष्णु लोक की प्राप्ति हुई और यह अद्भुत चमत्कार देखकर यमराज के दूत भी हैरान रह गए तथा बिना उसे लिए ही यमलोक वापस लौट गए।

पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भगवान श्री कृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के माध्यम से इस व्रत के महात्मय का विस्तार से वर्णन मिलता है। युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की यह एकादशी 'पापांकुशा' के नाम से विख्यात है और यह सभी पापों को नष्ट करने वाली है। इस पवित्र दिन पर संपूर्ण मनोरथ की सिद्धि के लिए स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाले पद्मनाभ स्वरूप भगवान वासुदेव (विष्णु जी) का पूजन करना चाहिए।

भगवान श्री कृष्ण ने यह भी बताया कि जो मनुष्य इस दिन भगवान गरुड़ध्वज को प्रणाम करता है, उसे जितेन्द्रिय मुनियों द्वारा दीर्घकाल तक कठोर तपस्या करने के बाद मिलने वाले फल के समान ही पुण्य फल प्राप्त हो जाता है। पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ और पवित्र देवालय हैं, उन सबके दर्शन और सेवन का पुण्य फल केवल भगवान विष्णु के नाम का कीर्तन मात्र से ही मनुष्य को मिल जाता है।

जो लोग शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाले सर्वव्यापक भगवान जनार्दन की शरण में जाते हैं, उन्हें कभी भी यमलोक की भयंकर यातनाएं नहीं भोगनी पड़ती हैं। यदि कोई मनुष्य किसी अन्य प्रसंग या कारणवश भी केवल एकादशी के दिन उपवास रख लेता है, तो उसे कभी यम यातना का सामना नहीं करना पड़ता है। इसके साथ ही जो पुरुष विष्णु भक्त होते हुए भी भगवान शिव की निंदा करता है, वह भगवान विष्णु के लोक में स्थान नहीं पा सकता और उसे अंततः नरक में गिरना पड़ता है। इसी प्रकार यदि कोई शैव या पाशुपत भक्त होकर भगवान विष्णु की निंदा करता है, तो उसे भी घोर रौरव नरक में तब तक पकाया जाता है जब तक कि चौदह इंद्रों की आयु पूरी नहीं हो जाती।

यह एकादशी व्रत मनुष्य को स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाला, शरीर को निरोग रखने वाला तथा सुंदर स्त्री, धन और उत्तम मित्र की प्राप्ति कराने वाला माना गया है। जो व्यक्ति एकादशी के दिन दिन में उपवास और रात्रि में जागरण करता है, उसे अनायास ही श्री विष्णु धाम की प्राप्ति हो जाती है। ऐसा व्रत करने वाला मनुष्य अपने मातृपक्ष की दस पीढ़ियों, पिता के पक्ष की दस पीढ़ियों और अपनी स्त्री पक्ष की भी दस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है।

एकादशी का व्रत करने वाले मनुष्य दिव्य रूपधारी, चतुर्भुज, गरुड़ की ध्वजा से युक्त, सुंदर हारों से सुशोभित और पीतांबर धारण करके सीधे भगवान विष्णु के परमधाम को प्रस्थान करते हैं। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में केवल पापांकुशा एकादशी का व्रत करने मात्र से ही मानव सभी पापों से पूरी तरह मुक्त होकर श्रीहरि के लोक को प्राप्त होता है।

जो पुरुष सुवर्ण (सोना), तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, जूते और छाते का दान करता है, उसे कभी भी यमराज के दर्शन नहीं होते हैं। यहां तक कि एक दरिद्र मनुष्य को भी चाहिए कि वह अपनी यथाशक्ति के अनुसार स्नान और दान आदि पवित्र क्रियाएं करके अपने प्रत्येक दिन को सफल बनाए। जो लोग होम, स्नान, जप, ध्यान और यज्ञ आदि पुण्य कर्म करते हैं, उन्हें कभी भी भयंकर यम यातनाएं नहीं देखनी पड़ती हैं।

संसार में जो भी मनुष्य लंबी आयु, धन, अच्छे कुल और निरोग शरीर वाले देखे जाते हैं, वे सभी पूर्व जन्म के पुण्यात्मा होते हैं और पुण्य कर्म करने वाले मनुष्यों की ऐसी ही स्थिति देखने को मिलती है। इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ, मनुष्य अपने पापों के कारण दुर्गति को प्राप्त होता है और धर्म के मार्ग पर चलकर स्वर्ग को जाता है।

ब्रह्म पुराण के अनुसार भी यह स्पष्ट किया गया है कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का व्रत यदि पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान विष्णु के पूजन के साथ किया जाए, तो मनुष्य को उसकी इच्छा के अनुसार मनोवांछित फल प्राप्त होता है। इस लोक में सुंदर स्त्री, पुत्र, धन और सभी प्रकार के सांसारिक सुखों को भोगने के अंत में वह मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है। साथ ही उसके मातृपक्ष, पितृपक्ष और स्त्री पक्ष के कुल मिलाकर तीसों पुरुखे भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप प्राप्त करके वैकुंठ धाम मेंि निवास करते हैं। शास्त्रों में यहां तक बताया गया है कि हजारों राजसूय और अश्वमेध यज्ञ करने का जो फल होता है, वह अकेला पापांकुशा एकादशी व्रत के पुण्य के बराबर नहीं हो सकता।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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