अधिक मास की यह एकादशी देती है मोक्ष और अपार शक्ति ; जानिए पद्मिनी एकादशी की पूरी कथा
पद्मिनी एकादशी, जो ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ती है, एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना गया है। इस कथा में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को सुनाई गई अधिक मास की एकादशी की महिमा, व्रत विधान और कार्तवीर्य अर्जुन द्वारा रावण पर विजय की पौराणिक कथा का विस्तार मिलता है, जो धर्म, भक्ति और मोक्ष की प्रेरणा देती है।

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पद्मिनी एकादशी, जिसे अधिक मास (लौंद मास) की अत्यंत पुण्यदायी तिथि माना जाता है, वर्ष 2026 में बुधवार, 27 मई को मनाई जाएगी। सनातन परंपरा में इस एकादशी को मोक्षदायिनी और समस्त पापों का नाश करने वाली तिथि के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत न केवल आध्यात्मिक शुद्धि प्रदान करता है, बल्कि विष्णुलोक की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
पौराणिक कथा की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण और पांडुपुत्र अर्जुन के संवाद से होती है। अर्जुन अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के स्वरूप, नाम, विधि और फल के विषय में प्रश्न करते हैं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण विस्तार से बताते हैं कि यह एकादशी “पद्मिनी” कहलाती है और इसका व्रत समस्त पापों का विनाश कर भक्त को विष्णुलोक तक पहुँचाने में सक्षम है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि इस व्रत का ज्ञान सर्वप्रथम देवर्षि नारद को प्राप्त हुआ था और यही विधान आगे चलकर जनकल्याण का माध्यम बना।
श्रीकृष्ण के अनुसार, इस व्रत का पालन अत्यंत अनुशासन और संयम के साथ किया जाता है। व्रत दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाता है, जिसमें साधक को कांसे के बर्तन का प्रयोग वर्जित रहता है। इस दिन मांस, मसूर, चना, कोदो, शहद, शाक तथा पराया अन्न ग्रहण करना निषिद्ध बताया गया है। केवल हविष्य भोजन, वह भी बिना नमक के, करने का विधान है। दशमी की रात्रि भूमि पर शयन और ब्रह्मचर्य पालन का विशेष निर्देश दिया गया है।
एकादशी के दिन प्रातःकाल नित्य क्रिया से निवृत्त होकर दातुन करने और बारह बार कुल्ला करने का विधान बताया गया है। इसके बाद साधक को पुण्य क्षेत्र में जाकर स्नान करना चाहिए। स्नान के लिए गोबर, मिट्टी, तिल, कुश और आंवले के चूर्ण का प्रयोग अत्यंत पवित्र माना गया है। स्नान से पूर्व शरीर पर मिट्टी लगाकर प्रार्थना करने का विधान भी वर्णित है, जिसमें पृथ्वी, औषधियों और भगवान विष्णु की स्तुति कर शुद्धि की कामना की जाती है। इसके बाद वरुण मंत्र का जप कर तीर्थों का स्मरण करते हुए स्नान पूर्ण किया जाता है।
स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर संध्या, तर्पण और मंदिर में भगवान विष्णु के पूजन का विधान है। इस पूजा में श्रीकृष्ण के साथ राधा जी तथा शिव-पार्वती की स्वर्ण निर्मित मूर्तियों का पूजन करने का उल्लेख मिलता है। धान्य के ऊपर मिट्टी या तांबे का कलश स्थापित कर उसे वस्त्र, गंध और पुष्पों से अलंकृत किया जाता है। कलश के मुख पर तांबा, चांदी या स्वर्ण पात्र रखा जाता है, जिसमें भगवान हरि की प्रतिमा स्थापित कर धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प और केसर से पूजा की जाती है।
पूजन के दौरान भगवान के समक्ष नृत्य और गायन करना, तथा भक्तों के साथ कथा श्रवण करना इस व्रत का महत्वपूर्ण अंग बताया गया है। इस दिन पतित या रजस्वला स्त्री के स्पर्श से दूर रहने का भी निर्देश मिलता है। व्रती को निर्जल उपवास रखने का विधान है, हालांकि असमर्थ होने पर अल्पाहार या जल ग्रहण की अनुमति भी वर्णित है। रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और भगवान के नाम स्मरण को अत्यंत पुण्यकारी बताया गया है।
रात्रि के चार प्रहरों में विशेष पूजा का विधान भी वर्णित है। प्रथम प्रहर में भगवान को नारियल अर्पित करने से अग्निहोम का फल, द्वितीय प्रहर में बिल्व फल से वाजपेय यज्ञ का फल, तृतीय प्रहर में सीताफल से अश्वमेध यज्ञ का फल और चतुर्थ प्रहर में सुपारी एवं नारंगी अर्पण करने से राजसूय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत सभी यज्ञ, तप और दान से श्रेष्ठ माना गया है।
कथा के दूसरे भाग में महर्षि पुलस्त्य और देवर्षि नारद के संवाद का वर्णन आता है, जिसमें कार्तवीर्य अर्जुन और रावण की कथा सामने आती है। नारदजी के प्रश्न पर महर्षि पुलस्त्य बताते हैं कि त्रेतायुग में महिष्मती नगरी में राजा कार्तवीर्य अर्जुन राज्य करते थे, जिनकी सौ रानियाँ थीं, परंतु कोई भी योग्य उत्तराधिकारी नहीं था। पुत्र प्राप्ति की कामना में राजा ने अनेक यज्ञ कराए, किंतु सफलता नहीं मिली। अंततः वे अपनी पत्नी प्रमदा के साथ गंधमादन पर्वत पर कठोर तपस्या करने चले गए।
दस हजार वर्षों की तपस्या के बावजूद सिद्धि प्राप्त न होने पर उनकी देह केवल अस्थि-पंजर रह गई। तब रानी प्रमदा ने महर्षि अनसूया से मार्गदर्शन मांगा। अनसूया ने उन्हें बताया कि अधिक मास में आने वाली दो एकादशियों शुक्ल पक्ष की पद्मिनी और कृष्ण पक्ष की परम एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं और इच्छित फल प्रदान करते हैं।
अनसूया के निर्देश पर रानी प्रमदा ने विधिपूर्वक पद्मिनी एकादशी का व्रत, उपवास और रात्रि जागरण किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। प्रमदा ने अपने पति के लिए पुत्र का वर मांगा। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जो देव, दानव और मनुष्यों से भी अजेय होगा। समय आने पर वही पुत्र कार्तवीर्य अर्जुन के रूप में जन्मा, जो भगवान विष्णु के अतिरिक्त किसी से पराजित नहीं हो सकता था। इसी शक्ति के कारण उसने महापराक्रमी रावण को युद्ध में परास्त कर बंदी बना लिया था। यह समस्त घटना पद्मिनी एकादशी व्रत के प्रभाव का दिव्य प्रमाण मानी जाती है।
कथा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यह व्रत अत्यंत दुर्लभ, पुण्यदायी और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो भी भक्त विधिपूर्वक पद्मिनी एकादशी का पालन करता है, वह सभी तीर्थों और यज्ञों का फल प्राप्त कर अंततः विष्णुलोक को प्राप्त करता है। इस प्रकार पद्मिनी एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संयम, श्रद्धा और भक्ति के माध्यम से आत्मिक उन्नति और दिव्य फल प्राप्त करने का सर्वोच्च मार्ग माना गया है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
