2 मई को मनाई जाएगी नारद जयंती ; जानिए सही तिथि, मुहूर्त और धार्मिक महत्व
नारद जयंती 2026, 2 मई को मनाई जाएगी। इस अवसर पर देवर्षि नारद के जन्म, उनकी भक्ति, त्रिलोक में संवाद की भूमिका और पौराणिक महत्व को श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। जानिए तिथि, मुहूर्त और इस पर्व की खास बातें।

देवर्षि नारद मुनि अपनी वीणा 'महती' के साथ
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में देवर्षि नारद को ज्ञान, संवाद और भक्ति के प्रतीक के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। उनकी जयंती, जिसे नारद जयंती के रूप में मनाया जाता है, इस वर्ष 2 मई 2026, शनिवार को पूरे देश में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जाएगी। यह पर्व केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि उस दिव्य परंपरा का उत्सव है, जिसने संवाद और सत्य को धर्म का आधार बनाया।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, देवर्षि नारद को त्रिलोक आकाश, पृथ्वी और पाताल में स्वतंत्र रूप से भ्रमण करने की अद्वितीय क्षमता प्राप्त थी। वे देवताओं के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान का प्रमुख माध्यम थे, जिसके कारण उन्हें पृथ्वी का प्रथम पत्रकार भी कहा जाता है। उनकी भूमिका कई बार घटनाओं में हलचल उत्पन्न करती थी, लेकिन उसका अंतिम उद्देश्य सृष्टि के संतुलन और कल्याण को सुनिश्चित करना होता था।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नारद मुनि ब्रह्मा के मानस पुत्र और भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। वे “नारायण, नारायण” का जप करते हुए अपनी वीणा ‘महती’ के साथ ब्रह्मांड में भ्रमण करते हैं। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में उनकी उपस्थिति एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में देखी जाती है, जो घटनाओं को गति देकर धर्म और सत्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वर्ष 2026 में नारद जयंती का निर्धारण प्रतिपदा तिथि के आधार पर किया गया है, जिसका विवरण इस प्रकार है:
- नारद जयंती: शनिवार, 2 मई 2026
- प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 1 मई 2026 को रात 10:52 बजे
- प्रतिपदा तिथि समाप्त: 3 मई 2026 को रात 12:49 बजे
पंचांग के अनुसार, यह पर्व उत्तर भारतीय पूर्णिमांत कैलेंडर में ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है, जबकि दक्षिण भारतीय अमांत कैलेंडर में यह वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को पड़ता है। यद्यपि मास का नाम भिन्न होता है, तिथि समान होने के कारण उत्सव एक ही दिन मनाया जाता है। आमतौर पर नारद जयंती, बुद्ध पूर्णिमा के अगले दिन आती है, हालांकि कुछ वर्षों में तिथि परिवर्तन के कारण दोनों पर्व एक ही दिन भी पड़ सकते हैं। यह संयोग इस पर्व को ज्योतिषीय दृष्टि से और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है।
नारद जयंती केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि संवाद, ज्ञान और भक्ति की उस परंपरा का प्रतीक है, जिसने भारतीय संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है। देवर्षि नारद का जीवन यह संदेश देता है कि सत्य और धर्म की स्थापना के लिए संचार और जागरूकता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में यह पर्व समाज को आध्यात्मिक प्रेरणा देने के साथ-साथ ज्ञान और संवाद की शक्ति का भी स्मरण कराता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
