भगवान महावीर के जीवन के एक-एक प्रसंग, एक-एक घटना, हमारे लिए साधना के फुटस्टेप्स हैं।जहां-जहां हम भगवान महावीर के चित्र को देखते हैं, उनके जीवन चरित्र को देखते हैं, उनके भावों को जानते हैं, वहाँ हमें बहुत कुछ सीखने और समझने को मिलता है, अलग-अलग प्रकार की साधना करने की प्रेरणा मिलती है।भगवान महावीर कभी भी निश्चित नहीं थें भगवान हमेशा मानते थे कि हर व्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता होती है, हर किसी को अपनी तरह से स्वतंत्र रहना पसंद होता है। इसलिए भगवान कभी भी किसी के उपकार के नीचे रहने का प्रयास नहीं करते थे, किसी के उपकार के नीचे रहने का प्रयास नहीं करते थे, किसी के आश्रय में रहने का प्रयास नहीं करते थें।भगवान महावीर जहां भी रहते थे, वहां यह ध्यान रखते थे कि मेरे कारण किसी को तकलीफ तो नहीं हो रही है! जहां उन्हें लगता कि मेरे कारण किसी को तकलीफ हो रही है, वहाँ से भगवान दूर चले जाते थें।


भगवान हमेशा चाहते थे कि मेरा बाह्य अस्तित्व और मेरा आंतरिक अस्तित्व किसी को भी तकलीफ देने वाला ना हो।

भगवान महावीर की विचारधारा बहुत अलग थी।भगवान कहते थे,“मुझे तो किसी से कोई तकलीफ नहीं है, लेकिन जिसे मेरे कारण तकलीफ होती हो, मुझे उस बात की भी तकलीफ होती है।” कैसी अद्भुत थी भगवान की विचारधारा!इसीलिए भगवान महावीर एकांत साधना के लिए जंगल, श्मशान और खंडहर जैसे स्थान पसंद करते थे, जहाँ किसी का आना-जाना न हो, ताकि उनके कारण किसी को तकलीफ न हो।और कभी-कभी यदि ऐसे स्थान पर भी किसी को भगवान से तकलीफ होती, तो भगवान वहाँ से भी मौन भाव से विहार कर जाते थें।किसी को भी कष्ट ना हो” ऐसी उत्कृष्ट आत्मदशा थी भगवान महावीर की!मेरे कारण किसी को भी अप्रीति नहीं होनी चाहिए भगवान महावीर का सिद्धांत था मेरे कारण किसी को दुःख ना हो, तकलीफ ना हो,नकारात्मक ना हो। मेरा जीवन किसी के दुःख का कारण ना बनें, मुझे पल-पल ऐसा जीवन जीना हैं।

कहा जाता है कि भगवान महावीर का प्रथम चातुर्मास था।एक तापस ने आकर भगवान से विनती की “प्रभु! वर्षा ऋतु है, और आप एक वृक्ष के नीचे खड़े हैं, वर्षा आएगी तो आप भीग जाएंगे। प्रभु! पास में ही मेरी बहुत सारी झोपड़ियाँ हैं, आप उन झोपड़ी में आकर ठहरिए।भगवान महावीर तापस की झोपड़ी में पधारे और वहाँ ध्यान साधना करने लगे।

भगवान अपनी ध्यान साधना में इतने लीन- तल्लीन हो जाते थे कि उन्हें पता ही नहीं चलता था कि कितना समय बीत गया है।


भगवान ध्यान साधना में इतने मग्न और एकाग्र हो जाते थे कि उन्हें यह भी ज्ञात नहीं रहता था कि उनके आसपास कौन आया और कौन गया।भगवान को किसी की परवाह नहीं थी, वे तो स्वयं ध्यानमग्न थे।याद रखो, जब हम दुनिया की परवाह से 'पर' हो जाते हैं, तब परमात्मा बनने के द्वार खुल जाते हैं।

भगवान तो अपनी साधना में मग्न थे, पर जिस झोपड़ी में भगवान थे, तापस की वह झोपड़ी घास की बनी हुई थी और एक गाय आकर उस झोपड़ी की घास खा रही थी।तापस ने दूर से यह दृश्य देखा और पास आकर पहले गाय को वहां से दूर किया, फिर भगवान के पास आकर कहने लगा

“एक तो मैंने आपको मुफ्त में झोपड़ी रहने के लिए दी, आपको रहने के लिए जगह दी, और आप उसका ध्यान भी नहीं रख रहे? आपको उसका ध्यान तो रखना चाहिए ना!”

न मैं गाय के भोजन में विघ्न डाल सकता हूं, न मैं तापस की समाधि में विक्षेप डाल सकता हूं।यह झोपड़ी तापस की निश्रा में है, उस पर उसका अधिकार है, यह उसकी मिल्कियत है,

झोपड़ी के नुकसान से उसे दुःख होता है, मेरे कारण उसे दुःख होता है।मेरे कारण किसी को अप्रीति हो, मेरे कारण किसी को दुःख हो, मेरे कारण किसी को तकलीफ हो ऐसे स्थान पर मैं कभी नहीं रहूंगा।ऐसी थी भगवान महावीर की करुणा भावना, वात्सल्य भावना और जगत के प्रति प्रेम भावना, ऐसी अद्भुत भावना के साथ भगवान महावीर ने वह स्थान छोड़ दिया, तापस की झोपड़ी छोड़ दी और चालू चातुर्मास में ही आगे बढ़ गए।

अब मुझे कहाँ स्थान मिलेगा, कैसा स्थान मिलेगा इसकी कोई चिंता किए बिना, महल में पले-बढ़े भगवान महावीर निश्चिंतता से आगे बढ़ते रहें।

भगवान को मानने का अर्थ यह नहीं है कि संसार का त्याग करके दीक्षा ले ली जाए।

प्रभु को मानने का अर्थ यह है कि जैसा जीवन प्रभु जीए, वैसा जीवन मुझे जीना है। प्रभु के गुणधर्मों को अपना धर्म बनाना यहीं तो होती हैं, प्रभु की सच्ची पूजा!

प्रभु के गुणधर्मों को जानकर, समझकर, उन्हें अपने जीवन में आचरण में लाना यहीं तो होती है प्रभु की सच्ची भक्ति!जैन आगम दर्शन में बताया गया है कि, जब भगवान ध्यानस्थ मुद्रा में होते थे तो छोटे-छोटे गाँवों के अज्ञानी बालक उन्हें पत्थर मारते थें, तब भी भगवान शांत रहते थें।अनार्य देश में अज्ञानी लोग भगवान के पीछे कुत्ते दौड़ाते थे, तब भी भगवान मौन रहते थें।कैसी होगी भगवान की करुणा और हृदय की ऋजुता!कितनी प्रेममय और वात्सल्यमय होगी भगवान की आत्मा!

यदि मैं भगवान का भक्त हूँ, तो…!

जांच करो…अपनी आप को...

यदि आप भगवान महावीर को मानते हो, तो क्या आपकी जीवनचर्या भगवान जैसी है?

क्या आपने कभी सोचा है कि मैं यहाँ बैठूँ तो किसी को तकलीफ तो नहीं होगी?

मैं सड़क पर चलूँ तो शांति से दाना चुग रहें कबूतर डरकर उड़ तो न जाएंगे!

मैं धप धप करता चलूँ तो शांति से सोया हुआ कुत्ता डरकर जाग नहीं जाएंगा ना!

भगवान के भक्त वहीं होते हैं, जो हमेशा जीवों की रक्षा करने वाले होते हैं, जीवों की जतना करने वाले होते हैं।भगवान महावीर के जीवन की एक-एक घटना हमें जीवन जीने की कला सिखाती हैं।भगवान का जीवन मंत्र था

“किसी को पीड़ा हो, ऐसा कोई कार्य मुझे नहीं करना है।आपकी वाणी व्यवहार, वर्तन,वचन ऐसे होने चाहिए कि किसी को अप्रीति ना हो, किसी को तकलीफ ना हो, किसी को दुःख ना हो और किसी को वेदना ना हो।सिद्धांत बहुत छोटा है, पर बहुत ही जरूरी है"

“जो किसी का अप्रीति पात्र नहीं बनता,उसे पूरे जगत से सम्मान मिलता है।”

भगवान का यह सिद्धांत, भगवान का यह जीवन मंत्र,भगवान की यह श्रेष्ठ सद्भावना भगवान को पूजनीय बनाती हैं। महावीर जयंती का सच्चे अर्थों में अर्थ यही है कि हम भगवान महावीर जैसे बने उनके दिखाए हुए मार्ग पर चलें तभी सच्चे अर्थों में महावीर जयंती का अर्थ सार्थक होगा।

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