हिंदू धर्म और दर्शन के अनंत आकाश में भगवान कार्तिकेय एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जो शक्ति, शौर्य और अगाध ज्ञान के अद्वितीय संगम का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिव और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र तथा गणेश के भ्राता के रूप में प्रतिष्ठित कार्तिकेय को ब्रह्मांडीय व्यवस्था में 'देवसेनापति' अर्थात देवताओं की सेना के प्रधान सेनानायक का पद प्राप्त है। वर्तमान युग में उनकी प्रासंगिकता उत्तर भारत में 'कुमार' और 'महासेन' के रूप में तो दक्षिण भारत में 'मुरुगन' के रूप में जीवंत है, जहाँ वे तमिल संस्कृति के संरक्षक और रक्षक देवता माने जाते हैं। उनका स्वरूप न केवल एक योद्धा का है, बल्कि वे 'शैव सिद्धांत' के प्रखर दार्शनिक और 'प्रणव मंत्र' (ॐ) के उस रहस्यमयी अर्थ के व्याख्याता भी हैं, जिसे उन्होंने स्वयं महादेव को सिखाया था।

कार्तिकेय के प्राकट्य की कथा पौराणिक और वैदिक साहित्य में अत्यंत अलौकिक है। स्कंद पुराण के अनुसार, तारकासुर के अत्याचारों से त्रस्त देवताओं की रक्षा हेतु महादेव के तेज से छह दिव्य स्फुल्लिंग उत्पन्न हुए, जिन्हें अग्नि ने गंगा में प्रवाहित किया। गंगा की लहरों ने उन्हें 'शरवण' वन की ओर मोड़ दिया, जहाँ छह शिशुओं का जन्म हुआ। इन शिशुओं का पालन-पोषण छह 'कृत्तिकाओं' ने किया, जिसके कारण उनका नाम 'कार्तिकेय' पड़ा। बाद में माता पार्वती ने इन छह बालकों को अपनी ममता से आलिंगनबद्ध किया, जिससे वे एक देह हो गए, परंतु उनके मुख छह ही रहे, जिससे वे 'षण्मुख' कहलाए। महाभारत और रामायण जैसे महाग्रंथों में उनके जन्म को धर्म की पुनर्स्थापना के लिए एक अनिवार्य दैवीय घटना के रूप में वर्णित किया गया है।

भगवान कार्तिकेय की चित्रकला और मूर्तिशिल्प उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाते हैं। वे अत्यंत तेजस्वी, चिर-युवा और पराक्रमी दिखाई देते हैं, जिनका वाहन 'परावणि' नामक मयूर है, जो चपलता और अहंकार पर विजय का प्रतीक है। उनके हाथों में 'वेल' (शक्ति) नामक दिव्य भाला सुशोभित है, जिसे साक्षात आदि शक्ति पार्वती ने उन्हें प्रदान किया था। यह 'वेल' केवल एक अस्त्र नहीं, बल्कि विवेक और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है, जो अज्ञान के अंधकार को भेदने की सामर्थ्य रखता है। उनके ध्वज पर कुक्कुट (मुर्गा) अंकित है, जो काल की घोषणा और जागरण का सूचक है। दक्षिण भारतीय परंपरा में वे वल्ली और देवयानी के साथ विराजते हैं, जो उनकी इच्छा शक्ति और क्रिया शक्ति का मानवीय निरूपण हैं।

सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से कार्तिकेय की व्याप्ति अत्यंत विशाल है। भारत के दक्षिण में उन्हें 'मुरुगन' के नाम से पुकारा जाता है, जहाँ 'तिरुमुरुगात्रुप्पदै' जैसे संगम साहित्य के ग्रंथ उनकी स्तुति में रचे गए हैं। तमिलनाडु के छह प्रसिद्ध मंदिर, जिन्हें 'आरुपदैवीडु' कहा जाता है, उनके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों के साक्षी हैं। वहीं, श्रीलंका, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देशों में 'थाईपुसम' जैसे उत्सवों के दौरान लाखों भक्त 'कावड़ी' उठाकर और 'वेल' से प्रतीकात्मक शारीरिक कष्ट सहकर अपनी अटूट श्रद्धा प्रकट करते हैं। 'ओम् शरवण भव' के मंत्रोच्चार और 'स्कंद षष्ठी' जैसे पर्वों के माध्यम से भक्त उनकी उस विजय का स्मरण करते हैं, जिसमें उन्होंने तारकासुर और सूरपद्मन जैसे असुरों का अंत कर ब्रह्मांड में शांति स्थापित की थी।

कार्तिकेय का व्यक्तित्व केवल युद्ध तक सीमित नहीं है, अपितु वे त्याग और वैराग्य के भी प्रतीक हैं। ज्ञान के फल (आम) की प्राप्ति के लिए पृथ्वी की परिक्रमा वाली कथा उनके बौद्धिक विवेक को दर्शाती है। जब वे कैलाश त्याग कर पलानी की पहाड़ियों पर एक तपस्वी के रूप में रहने लगे, तो उन्होंने सिद्ध किया कि वास्तविक ज्ञान बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि अंतर्मन की शांति में निहित है। वे 'ब्रह्मण्य' हैं, जो ऋषियों और मुनियों को भी सत्य का मार्ग दिखाते हैं। इस प्रकार, भगवान कार्तिकेय का स्वरूप एक ओर जहाँ असुरों का दलन करने वाली अजेय शक्ति का है, वहीं दूसरी ओर वे एक सौम्य मार्गदर्शक हैं, जो नैतिकता और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

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