उत्तर प्रदेश के कानपुर में स्थित एक रहस्यमयी और प्राचीन मंदिर के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अब डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी यानी एकेटीयू ने एक बड़ी पहल की है। कानपुर का यह अनोखा मंदिर मानसून के आने से ठीक सात दिन पहले बारिश की भविष्यवाणी करने के लिए देश भर में जाना जाता है। इस अनोखी और अचंभित करने वाली घटना के पीछे छिपे वैज्ञानिक और पारंपरिक कारणों का पता लगाने के लिए एकेटीयू के प्लानिंग और आर्किटेक्चर विभाग ने इस मंदिर पर एक व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन शुरू करने का निर्णय लिया है। इस रिसर्च के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि आखिर मंदिर की बनावट और इसके पर्यावरण के बीच ऐसा क्या संबंध है जिसके कारण बारिश से पहले यह खास प्राकृतिक संकेत दिखाई देते हैं।

कानपुर के इस प्राचीन और रहस्यमयी मानसून मंदिर के रहस्यों को तलाशने की यह पूरी रिसर्च एकेटीयू के हाल ही में स्थापित किए गए 'इंडियन नॉलेज सिस्टम' यानी आईकेएस सेंटर के अंतर्गत की जाएगी। इस विशेष सेंटर का मुख्य उद्देश्य भारत की प्राचीन और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण, वैज्ञानिक रिसर्च और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। इस सेंटर को स्थापित करने के लिए लगभग पचास लाख रुपये की लागत आई है। यह सेंटर देश की प्राचीन वास्तुकला परंपराओं के विकास और उनके वैज्ञानिक आधार को गहराई से समझने के लिए विभिन्न भारतीय भाषाओं में लिखे गए पुराने आर्किटेक्चर ग्रंथों का लगातार अध्ययन और उनका अनुवाद करने का काम कर रहा है।

प्लानिंग और आर्किटेक्चर विभाग की डीन और प्रिंसिपल वंदना सहगल ने इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि विभाग के अनुभवी शिक्षकों और रिसर्चर्स की एक आठ सदस्यीय विशेष टीम इस समय कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर एक साथ काम कर रही है। इन सभी प्रोजेक्ट्स का मुख्य उद्देश्य आधुनिक और उन्नत एकेडमिक रिसर्च के माध्यम से भारत के प्राचीन पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखना, उसे बढ़ावा देना और उसकी नई व वैज्ञानिक व्याख्या करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन्हीं महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में से एक प्रमुख प्रोजेक्ट कानपुर के इस प्राचीन मानसून मंदिर पर पूरी तरह से केंद्रित है, जिसके बारे में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि यह मंदिर मानसून का मौसम शुरू होने से ठीक सात दिन पहले ही बारिश होने की सटीक भविष्यवाणी कर देता है।

स्थानीय स्तर पर लोगों का ऐसा अटूट विश्वास और मान्यता है कि जैसे ही क्षेत्र में मानसून के आने का समय नजदीक आता है, उससे ठीक सात दिन पहले मंदिर की छत के अंदरूनी हिस्से से अपने और स्वतः पानी की बूंदें टपकने लगती हैं। इस पूरी घटना के पीछे के वास्तविक कारणों को जानने के लिए एकेटीयू के रिसर्चर्स मंदिर के पूरे आर्किटेक्चरल डिजाइन, इसके निर्माण में उपयोग की गई सामग्रियों और वहां की आसपास की पर्यावरणीय स्थितियों की बारीकी से जांच-पड़ताल करेंगे। यूनिवर्सिटी की यह शोध टीम यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि मंदिर के भीतर यह अनोखी घटना क्या अत्यधिक नमी, वायुमंडल में होने वाले अचानक बदलावों, कैपिलरी एक्शन यानी केशिका क्रिया या फिर किसी अन्य प्राकृतिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम है। इस विशेष अध्ययन में पारंपरिक लोक मान्यताओं और आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों का एक अनूठा समन्वय किया जाएगा, जिससे यह साफ हो सके कि क्या वास्तव में मंदिर का प्राचीन डिजाइन मौसम परिवर्तन और भविष्यवाणी के बारे में कोई पुख्ता जानकारी देता है।

कानपुर के इस चर्चित मानसून मंदिर का वास्तविक नाम श्री जगन्नाथ मंदिर है, जो कानपुर जिले के भीतरगांव विकासखंड मुख्यालय से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित बेहटा गांव की पावन भूमि पर खड़ा है। इस ऐतिहासिक मंदिर को लेकर क्षेत्र में ऐसी गहरी मान्यता है कि बारिश शुरू होने से ठीक सात दिन पहले इसकी छत से पानी की कुछ बूंदें टपकनी शुरू हो जाती हैं, जिन्हें देखकर स्थानीय लोग और किसान आगामी मानसून का अंदाजा लगाते हैं। इससे पहले भी देश और दुनिया के कई वैज्ञानिक इस मंदिर के भीतर से पानी टपकने के पीछे छिपे रहस्य को सुलझाने के लिए कई बार मौके पर आकर इसका सर्वेक्षण और मुआयना कर चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद वे आज तक इस मंदिर के सटीक निर्माण काल और इसके भीतर होने वाली इस रहस्यमयी घटना के असली समय व कारणों का सही पता नहीं लगा सके हैं। अब एकेटीयू की इस उच्च स्तरीय रिसर्च टीम द्वारा विधिवत अध्ययन शुरू किए जाने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही इस अनोखे मंदिर के प्राचीन रहस्यों से वैज्ञानिक रूप से पर्दा उठ सकेगा।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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