भविष्यपुराण में वर्णित बत्तीसी पूर्णिमा व्रत का विस्तृत धार्मिक विधान सामने आया है, जिसमें इसके आरम्भ, संकल्प, पूजा विधि, उपवास नियम, पारण प्रक्रिया और उद्यापन तक की संपूर्ण परंपरा का उल्लेख किया गया है। यह व्रत सुख-समृद्धि, सौभाग्य और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

हिन्दू धर्मग्रंथों में पूर्णिमा व्रत को अत्यन्त पवित्र और फलदायी साधना के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, जिसे प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर श्रद्धापूर्वक संपन्न किया जाता है। भविष्यपुराण में विशेष रूप से वर्णित बत्तीसी पूर्णिमा व्रत, जिसे द्वात्रिंशी पूर्णिमा व्रत भी कहा जाता है, का उल्लेख एक अत्यन्त विस्तृत और अनुशासित धार्मिक विधान के रूप में मिलता है, जिसमें इसके आरम्भ, पालन, उपवास नियम, पूजा विधि और अंततः उद्यापन तक की संपूर्ण प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है।


यह व्रत मार्गशीर्ष, माघ तथा वैशाख माह की पूर्णिमा से आरम्भ होकर भाद्रपद एवं पौष माह की पूर्णिमा पर उद्यापन के साथ पूर्ण किया जाता है, जबकि इस व्रत से सुख, सौभाग्य तथा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होने की मान्यता बताई गई है। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास की अधिक पूर्णिमा के अवसर पर यह व्रत विशेष महत्व रखता है। पंचांग के अनुसार अधिक पूर्णिमा उपवास शनिवार, 30 मई 2026 को निर्धारित है, जब शुक्ल पक्ष की ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा तिथि पर चंद्रोदय शाम 05:56 बजे होगा।

व्रत की प्रारंभिक प्रक्रिया में प्रातःकाल स्नान और तर्पण का विशेष महत्व बताया गया है। यदि किसी पवित्र नदी में स्नान संभव न हो, तो घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करने का विधान है। इसके पश्चात व्रती संकल्प ग्रहण करता है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा जाता है “मैं अपने परिवार की कुशलता एवं सुख-सौभाग्य तथा समृद्धि की कामना से द्वात्रिंशी पूर्णिमा का व्रत करूँगा। व्रत के निर्विघ्न पूर्ण होने हेतु भगवान गणपति की पूजा एवं कलश पूजन भी करूँगा।” संकल्प के उपरांत सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है और भगवान गणेश का विधिवत पूजन किया जाता है।

इसके पश्चात देवी पार्वती सहित भगवान शिव की षोडशोपचार विधि से विस्तृत पूजा-अर्चना की जाती है। इसके साथ ही विभिन्न परंपराओं के अनुसार भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी तथा चन्द्रदेव की आराधना का भी विशेष विधान बताया गया है। व्रती दिनभर उपवास रखते हुए भजन, जप और ध्यान में लीन रहता है तथा पूर्ण धार्मिक अनुशासन का पालन करता है। सायंकाल के समय चन्द्रदेव को अर्घ्य अर्पित कर उनका पूजन किया जाता है और पूर्णिमा व्रत कथा का श्रवण एवं पाठ किया जाता है। इस दिन सत्यनारायण व्रत कथा का आयोजन भी अत्यन्त शुभ और फलदायी माना गया है।

आहार संबंधी परंपराओं में केवल जल, फल तथा दुग्धजन्य सात्विक पदार्थों के सेवन की अनुमति दी गई है, जबकि सभी प्रकार के अनाज, मसाले, तामसिक भोजन, तम्बाकू, चाय और कॉफी का पूर्ण निषेध बताया गया है। कुछ साधक इस व्रत को अत्यन्त कठोर रूप में केवल जल पर रहकर भी संपन्न करते हैं। व्रत के पारण की प्रक्रिया चन्द्रदर्शन और चन्द्रदेव को अर्घ्य अर्पित करने के बाद संपन्न होती है। इसके पश्चात यथाशक्ति ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, घी, तिल और चावल का दान करने का विधान है। ब्राह्मण भोज एवं दक्षिणा देने के उपरांत स्वयं फलाहार ग्रहण कर व्रत का समापन किया जाता है।

भविष्यपुराण में वर्णित उद्यापन विधि इस व्रत का सबसे विस्तृत और महत्वपूर्ण चरण माना गया है, जिसे विशेष धार्मिक अनुष्ठान के रूप में सम्पन्न किया जाता है। इसके अनुसार भूमि को लीपकर चौक पूरने के बाद उसके मध्य में मिट्टी का कलश स्थापित किया जाता है, जिसके ऊपर बाँस का पात्र रखकर उसे ढँक दिया जाता है। इसके पश्चात यथाशक्ति एक या आधे पल स्वर्ण की श्री उमा-महेश्वर की मूर्ति निर्मित करवाई जाती है, जिसे वृषभ सहित उस पात्र पर स्थापित किया जाता है।

इसके बाद भगवान शिव की षोडशोपचार विधि से विस्तृत पूजा की जाती है। रात्रिकाल में भजन, कीर्तन एवं जागरण का विधान है। प्रातःकाल स्नानादि के पश्चात शिव पंचाक्षर मंत्र से हवन किया जाता है, जिसमें तिल, यव और घी के मिश्रण से 108 आहुतियाँ दी जाती हैं। हवन पूर्ण होने के पश्चात आचार्यों का पूजन किया जाता है।

उद्यापन के दौरान बत्तीस प्रकार के फलों को वस्त्र में लपेटकर दीपक को धान के ऊपर रखकर “वाणकं तव तुष्टयर्थं ददामी गिरिजापते।” मंत्र का उच्चारण करते हुए आचार्य को अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही बत्तीस ब्राह्मणों तथा बत्तीस स्त्रियों को छहों रसों से युक्त भोजन अर्पित करने का विधान बताया गया है। धर्मग्रंथों में इस अवसर पर आचार्य को बछड़े सहित गाय दान करने का विशेष महत्व भी वर्णित है, यद्यपि सामर्थ्य न होने की स्थिति में यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त करने का निर्देश दिया गया है।

अंततः पूर्णाहुति के साथ हवन का समापन किया जाता है और ब्राह्मण भोज के उपरांत शेष सामग्री का स्वयं सेवन कर व्रत की पूर्णता प्राप्त की जाती है। इस प्रकार भविष्यपुराण में वर्णित बत्तीसी पूर्णिमा व्रत न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह संयम, दान, भक्ति और आध्यात्मिक अनुशासन का ऐसा समग्र स्वरूप प्रस्तुत करता है, जो भारतीय सनातन परंपरा की गहन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को प्रतिबिंबित करता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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