रमज़ान का पवित्र महीना अपने अंतिम चरण में पहुंचते ही मुस्लिम समुदाय के बीच एक ऐसी रात की प्रतीक्षा शुरू हो जाती है, जिसे इस्लाम में अत्यंत महान और बरकतों से भरी माना जाता है। इस रात को शब-ए-क़द्र या लैलत-उल-क़द्र कहा जाता है। मान्यता है कि इसी पवित्र रात में अल्लाह ने पहली बार क़ुरआन की आयतें पैगंबर हज़रत मुहम्मद पर फरिश्ते जिब्रील के माध्यम से अवतरित की थीं।

साल 2026 में भारत में शब-ए-क़द्र के 16 मार्च की रात से 17 मार्च की सुबह तक मनाए जाने की संभावना है। यह रमज़ान की 27वीं रात मानी जाती है और परंपरागत रूप से सबसे अधिक संभावित लैलत-उल-क़द्र मानी जाती है। इस दौरान मस्जिदों और घरों में देर रात तक इबादत, कुरआन की तिलावत और दुआओं का सिलसिला चलता है।


शब-ए-क़द्र का अर्थ और आध्यात्मिक महत्व:

“शब” का अर्थ है रात, जबकि “क़द्र” का अर्थ ताकत, फैसला या तकदीर से जुड़ा हुआ है। इसी कारण इसे अक्सर “नाइट ऑफ पावर” या “नाइट ऑफ डिक्री” कहा जाता है। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, यह रात इतनी महान है कि इस दौरान की गई इबादत को हज़ार महीनों (लगभग 83 वर्षों) की इबादत से भी बेहतर बताया गया है। कुरआन की सूरह अल-क़द्र में इस रात की विशेषता का उल्लेख मिलता है, जिसमें कहा गया है कि इस रात में फरिश्ते धरती पर उतरते हैं और अल्लाह की रहमत और बरकतें बंदों पर बरसती हैं।


रमज़ान की आखिरी दस रातों में तलाश:

इस्लामी परंपरा के अनुसार शब-ए-क़द्र रमज़ान की आखिरी दस रातों में से किसी भी विषम (Odd) रात में हो सकती है। इसलिए मुस्लिम समुदाय इन दिनों में विशेष रूप से इबादत में समय बिताता है।

आमतौर पर जिन रातों को अधिक महत्व दिया जाता है, वे हैं:

  • 21वीं रात
  • 23वीं रात
  • 25वीं रात
  • 27वीं रात
  • 29वीं रात

हालांकि कई विद्वानों के अनुसार 27वीं रात को लैलत-उल-क़द्र होने की संभावना सबसे अधिक मानी जाती है, इसलिए इसी रात को सबसे ज्यादा इबादत की जाती है।


इस रात में की जाने वाली इबादत:

शब-ए-क़द्र की रात को मुसलमान अल्लाह की इबादत में पूरी रात बिताने की कोशिश करते हैं। मस्जिदों में विशेष नमाज़ें अदा की जाती हैं और लोग अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। इस दौरान की जाने वाली प्रमुख धार्मिक गतिविधियों में शामिल हैं:

  • क़ियाम-उल-लैल या तहज्जुद की नमाज़
  • कुरान की तिलावत
  • दुआ और इबादत
  • इस्तिग़फ़ार (गुनाहों की माफी मांगना)
  • सदक़ा या दान देना


हदीस के अनुसार हज़रत आयशा को पैगंबर मुहम्मद ने इस रात के लिए एक खास दुआ सिखाई थी:

  • “अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल अफ़्वा फ़ा'फु अन्नी।”

अर्थात: हे अल्लाह, तू बहुत माफ करने वाला है और माफी को पसंद करता है, इसलिए मुझे माफ कर दे।


लैलत-उल-क़द्र की पहचान के संकेत:

इस्लामी परंपराओं और अहादीस में इस रात के कुछ संकेतों का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि इन्हें अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता, लेकिन कई लोग इन संकेतों को अनुभव के रूप में बताते हैं।

  • रात का माहौल बेहद शांत और सुकूनभरा होता है
  • मौसम सामान्य और हल्का महसूस होता है
  • सुबह सूरज बिना तेज किरणों के उगता है

अहादीस के अनुसार शब-ए-क़द्र के अगले दिन सूर्योदय एक विशेष रूप में दिखाई देता है। सूरज की रोशनी सामान्य दिनों की तुलना में कमजोर और फीकी होती है, जिससे उसे सीधे देखना भी संभव हो जाता है। पैगंबर मुहम्मद ने इसे “पीतल की थाली” या “तश्तरी” के समान बताया है, जिसमें तेज किरणें नहीं होतीं। कई धार्मिक परंपराओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि उस दिन सूर्योदय के समय शैतान सूरज के साथ नहीं उगता, और सुबह का वातावरण सामान्य दिनों की तुलना में अधिक शांत और साफ दिखाई देता है।


रमज़ान की इस पवित्र रात को मुस्लिम समुदाय के लिए आध्यात्मिकता की चरम अभिव्यक्ति माना जाता है। हजार महीनों से बेहतर बताई जाने वाली इस रात में की गई इबादत को जीवन भर की आध्यात्मिक पूंजी के रूप में देखा जाता है। इसी कारण दुनिया भर के मुसलमान रमज़ान के आखिरी दिनों में विशेष रूप से जागकर इबादत करते हैं, ताकि इस अनमोल रात की बरकतों से वंचित न रह जाएं।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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