प्रयागराज/लखनऊ: संगम की रेती पर अध्यात्म और आस्था के सबसे बड़े समागम 'माघ मेला' में इस बार भक्ति की बयार के साथ-साथ आक्रोश की ज्वाला भी धधक रही है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रशासन और सरकार के रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे 'साधु-संतों का अपमान' करार दिया है। अपमान और उपेक्षा की इस पीड़ा ने अब एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया है, जिसका केंद्र अब प्रयागराज नहीं बल्कि प्रदेश की राजधानी लखनऊ बनने जा रही है।

अपमान की पीड़ा और निर्णायक संघर्ष का बिगुल

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मेले के दौरान जिस प्रकार से संतों की गरिमा को ठेस पहुंचाई गई, उसे अब सहन नहीं किया जाएगा। उन्होंने घोषणा की है कि माफी मांगने का समय अब बीत चुका है और अब निर्णायक कदम उठाने की बारी है। इसी संकल्प के साथ 10 और 11 मार्च को संत समाज का एक विशाल प्रतिनिधिमंडल लखनऊ कूच करेगा।

शंकराचार्य ने कहा, "सब बातें अब पीछे छूट गई हैं। हमने बार-बार संवाद की कोशिश की, लेकिन जब सम्मान ही सुरक्षित न हो, तो मौन रहना अपराध है। अब दिल्ली की जगह लखनऊ में बैठकर अपनी बात रखी जाएगी।"

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष धर्म का 'प्रश्न'

इस आंदोलन का रुख केवल संतों के सम्मान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में 'गौ रक्षा' का मुद्दा भी प्रमुखता से खड़ा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष एक सीधा और गंभीर प्रश्न रखा है। उन्होंने मांग की है कि:

  • भारत से होने वाले गोमांस के निर्यात पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया जाए।
  • गौवंश की रक्षा के लिए ठोस और प्रभावी कानून जमीन पर लागू हों।
  • सनातन परंपराओं में गौ माता की जो प्रतिष्ठा है, उसे प्रशासनिक स्तर पर भी अक्षुण्ण रखा जाए।

मेला प्रशासन पर गंभीर आरोप

शंकराचार्य का आरोप है कि इस वर्ष माघ मेले में संतों की सुविधाओं, उनके स्थान आवंटन और परंपरागत अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया गया है। जहां एक ओर सरकार धर्म की जय-जयकार करती है, वहीं दूसरी ओर मेले के धरातल पर संतों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। इसी असंतोष ने संतों को एकजुट होकर सत्ता के द्वार तक जाने पर मजबूर कर दिया है।

आगामी कार्ययोजना: लखनऊ में जुटेगा संत समाज

संतों की इस महापंचायत के लिए रणनीतियां तैयार कर ली गई हैं। 10-11 मार्च को होने वाला यह जमावड़ा सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

  • शक्ति प्रदर्शन: प्रदेश भर से विभिन्न अखाड़ों और मठों के संत लखनऊ में एकत्रित होंगे।
  • सीधा संवाद: संत समाज सीधे मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी मांगों और मेले में हुए अपमान का हिसाब माँगेगा।
  • धार्मिक एजेंडा: गोमाता को 'राष्ट्र माता' का दर्जा दिलाने और मांस निर्यात रोकने की मांग को धार दी जाएगी।

आस्था और सत्ता के बीच का गतिरोध

माघ मेले से उठी यह चिंगारी अब राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर रही है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का यह कड़ा रुख इस बात का संकेत है कि साधु-संत अब केवल आशीर्वाद देने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए सत्ता से प्रश्न पूछने में भी नहीं हिचकेंगे। लखनऊ कूच का यह निर्णय न केवल प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा करेगा, बल्कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की धार्मिक और राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित कर सकता है।

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