बिहार में छठ महापर्व की मान्यता बड़े पैमाने पर है। हिन्दुओं के साथ-साथ मुस्लमान और अन्य धर्मावलंबी भी इस त्यौहार को हर्षोल्लास के साथ मानते हैं। छठ पूजा सूर्य, प्रकृति,जल, वायु और उनकी बहन छठी म‌इया को समर्पित है। छठी मैय्या को मैथिलि में रनबे माय भी कहा जाता है, भोजपुरी में सबिता माई और बंगाली में रनबे ठाकुर बुलाया जाता है।


यह महापर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। कहा जाता है यह पर्व मैथिल,मगही और भोजपुरी लोगों का सबसे बड़ा पर्व है। छठ महापर्व का अनुष्ठान बहुत कठिन है और चार दिनों की अवधि में इसे मनाया जाता है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।


आइए जानते हैं इस महापर्व के चार दिनों के अवधि के बारे में:

नहाय खाय-

'नहाय-खाय' छठ पर्व का पहला दिन होता है और इसकी शुरुवात चैत्र या कार्तिक महीने के चतुर्थी कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होती है। घरों की साफ़-सफाई करके उससे पवित्र किया जाता है। उसके बाद व्रती अपने नजदीक में स्थित गंगा नदी,गंगा की सहायक नदी या तालाब में जाकर स्नान करते है। व्रती इस दिन अपने नाखूनों को अच्छे से काट कर और बालों को अच्छे से धोकर स्नान करती है और इस दिन केवल एक ही बार खाना खाती है। खाने में मुख्य रूप से कद्दू (लौकी) की सब्जी ,मुंग चना दाल, चावल का उपयोग करते है। यह खाना कांसे या मिटटी के बर्तन में पकाया जाता है। खाना पकाने के लिए आम की लकड़ी और मिटटी के चूल्हे का इस्तेमाल किया जाता है।



खरना और लोहंडा-

'खरना' छठ पर्व का दूसरा दिन होता है जिसे 'लोहंडा' बी ही कहते हैं। इस दिन व्रती पुरे दिन उपवास रखती हैं और पानी की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते है। शाम को चावल गुड़ और गन्ने के रस का प्रयोग कर खीर बनाया जाता है। खाना बनाने में नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है। इन्हीं दो चीजों को पुन: सूर्यदेव को नैवैद्य देकर उसी घर में ‘एकान्त' करते हैं अर्थात् एकान्त रहकर उसे ग्रहण करते हैं। परिवार के सभी सदस्य उस समय घर से बाहर चले जाते हैं ताकी कोई शोर न हो सके। एकान्त से खाते समय व्रती हेतु किसी तरह की आवाज सुनना पर्व के नियमों के विरुद्ध है।



संध्या अर्घ्य-

छठ पर्व का तीसरा दिन जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है, चैत्र या कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। पुरे दिन सभी लोग मिलकर पूजा की तैयारिया करते है। छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद जैसे ठेकुआ, चावल के लड्डू जिसे कचवनिया भी कहा जाता है, बनाया जाता है । छठ पूजा के लिए एक बांस की बनी हुयी टोकरी जिसे दउरा कहते है में पूजा के प्रसाद,फल डालकर देवकारी में रख दिया जाता है। वहां पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल, पांच प्रकार के फल और पूजा का अन्य सामान लेकर दउरा में रख कर घर का पुरुष अपने हाथो से उठाकर छठ घाट पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो इसलिए इसे सर के ऊपर की तरफ रखते है। छठ घाट की तरफ जाते हुए रास्ते में प्रायः महिलाये छठ का गीत गाते हुए जाती है।



नदी या तालाब के किनारे जाकर महिलाये घर के किसी सदस्य द्वारा बनाये गए चबूतरे पर बैठती है। सूर्यास्त से कुछ समय पहले सूर्य देव की पूजा का सारा सामान लेकर घुटने भर पानी में जाकर खड़े हो जाते है और डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देकर पांच बार परिक्रमा करते है।


उषा अर्घ्य-

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती लोग सूर्योदय से पहले ही घाट पर उगते सूरज की पूजा करने पहुँच जाते हैं। शाम की ही तरह उनके पुरजन-परिजन उपस्थित रहते हैं। संध्या अर्घ्य में अर्पित पकवानों को नए पकवानों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है परन्तु कन्द, मूल, फलादि वही रहते हैं। पूजा-अर्चना समाप्तोपरान्त घाट का पूजन होता है। वहाँ उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरण करके व्रती घर आ जाते हैं और घर पर भी अपने परिवार आदि को प्रसाद वितरण करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं। व्रती लोग खरना दिन से आज तक निर्जला उपवासोपरान्त आज सुबह ही नमकयुक्त भोजन करते हैं।

घर वापस आकर व्रती पीपल के पेड़ जिससे ब्रह्म बाबा भी कहते हैं वहां जाकर पूजा करते हैं। पूजा के बाद कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा प्रसाद खाकर व्रती अपना उपवास पूर्ण करते हैं जिसे पारण भी कहते हैं।



महापर्व छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते समय अनेकों सुमधुर और भक्ति-भाव से पूर्ण लोकगीत गाए जाते हैं। मुख्य रूप से शारदा सिन्हा के छठ गीत बहुत प्रसिद्ध हैं। छठ महापर्व के कुछ प्रसिद्ध गीत -

  • काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए
  • केलवा के पात पर
  • ऊगू हे सूरज देव भईल भिनसरवा
  • बांझी केवड़वा धइले ठाढ़
  • कार्तिक मास इजोरिया
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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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