नाथ संप्रदाय की पावन कथा में मच्छिंद्रनाथ का जन्म अत्यंत अद्भुत और दिव्य घटनाओं से परिपूर्ण बताया गया है। मच्छिंद्रनाथ का जन्म एक मछली के अंडे से हुआ, जिसमें वे भगवान शिव के उपदेश का चिंतन, मनन और पठण कर रहे थे। उचित समय आने पर मछली ने अंडों को यमुना के तट पर फेंका, और स्वयं पानी में लौट गई। कुछ दिनों बाद वहां बगुलों का झुंड आया, जिसने अंडों को चोच से तोड़ दिया। अंडों से एक तेजस्वी बालक प्रकट हुआ, जिसका रोना सुनकर बगुले डरकर उड़ गए।

इसी समय कामिक नामक कोली वहां आया और उसने बालक को देखा। प्रारंभिक झिझक और द्विधा के बाद, उसे आकाशवाणी सुनाई दी, “हे कामिक! यह दिव्य बालक कविनारायण है, जो जनकल्याण हेतु मत्स्यी के पेट से प्रकट हुआ है। इसे अपने घर ले जाओ और मच्छिंद्र नाम रखकर पालन-पोषण करो।” कामिक ने बालक को अपने घर ले जाकर अपनी पत्नी के साथ अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से उसका पालन-पोषण किया। बालक का नाम मच्छिंद्र रखा गया और पांच वर्ष की उम्र तक उनके घर में उसकी देखभाल हुई।

एक दिन कामिक ने नदी पर मच्छिंद्र को अपने साथ ले जाकर पकड़ी गई मछलियों को संभालने का कार्य सौंपा। लेकिन जैसे ही कामिक मछलियाँ पकड के मच्छिंद्र के तरफ फेंकते, उन मछलियों को तड़फता देख मच्छिंद्र ने उनको सुरक्षित पानी में छोड़ दिया, जिससे कामिक को क्रोध आया और उसने उसे थप्पड लगा दी। इस घटना ने मच्छिंद्र को आत्मिक शिक्षा दी कि किसी की जान लेकर खाने से बेहतर भिक्षा लेकर खाने में अधिक पुण्य और धर्मनिष्ठा है। इसके पश्चात् मच्छिंद्र अपने धर्मपिता कामिक की नजर बचाकर वहा से भाग निकले बद्रिकाश्रम के घने जंगलो की ओर प्रस्थान किया, जहां उन्होंने तपश्चर्या और भक्ति की पवित्रता का अनुभव किया।

उसके बाद मच्छिंद्र तीर्थयात्रा पर निकले वहा उन्होंने सप्तशंगी तीर्थ का दर्शन किया और देवी जगदंबा के आशीर्वाद से लोक कल्याण हेतु शाबरी विद्या का कवित्व रचने का प्रण लिया। उन्होंने सात दिन तक अंबा देवी के समक्ष अनुष्ठान किया, जिसके फलस्वरूप देवी प्रसन्न हुईं और मच्छिंद्र को मार्गदर्शन प्रदान किया। देवी ने मच्छिंद्र को मार्तंड पर्वत पर बीज मंत्र से हवन करने के लिए कहा, जिससे वहां पर सुखा पड़ा वृक्ष सुवर्णमय हो गया और वृक्ष के प्रत्येक शाखा पर दैविक शक्तियाँ प्रकट हुईं।

लेकिन इन दैविक शक्तियों को प्रसन्न करना इतना आसान नही था। उन्हे प्रसन्न करने हेतु देवी ने मच्छिंद्र से कहा की वो ब्रह्मगिरी को जाए, वहा अंजनपर्वत है। वहा से दक्षिण की ओर काचित नाम की नदी बहती है। उस नदीकिनारे हाथी के पैर जितने सौ जलकुंड है और वही महाकाली का स्थान भी है। तो पहले महाकाली का दर्शन लेकर वहा पड़ी शुक्लवेल ले और उसके तुकड़े उन कुंडो में डाले। जो भी तुकड़ा सजीव हो जाए उस कुंड में स्नान कर वापस आकर उस कुंड का पानी सुवर्णमय वृक्ष को डालें जिससे एक दैवी प्रसन्न होगी और आशिर्वाद देगी। और ऐसा हर बार करना होगा जब तक पेड़ पर बैठी हर शक्ती प्रसन्न नही होगी। मच्छिंद्र के छे महिने के अथक परिश्रम के बाद जाकर सब शक्तियाँ प्रसन्न हुई और शाबरी विद्य़ा नाम के विशेष ग्रंथ की निर्मिती हो गई। और आगे ऐसे ही मच्छिंद्र का महिमा बढ़ता गया।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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