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खिचड़ी जैसा साधारण व्यंजन कैसे बना मकर संक्रांति के लिए खास ; जानिए परंपरा और आस्था का स्वादिष्ट इतिहास
By Manyaa ChaudharyPublished on
उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति को ‘खिचड़ी’ क्यों कहा जाता है—इस लेख में जानिए इसके पीछे छिपी धार्मिक आस्था, कृषि परंपरा, मौसम और स्वास्थ्य से जुड़ी वजहें। खिचड़ी पर्व की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता को पत्रकारिता शैली में विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।

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मकर संक्रांति 2026
उत्तर प्रदेश और बिहार सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में मकर संक्रांति को केवल एक खगोलीय पर्व नहीं माना जाता, बल्कि इसे ‘खिचड़ी’ के नाम से जाना जाता है। यह नामकरण सदियों पुरानी परंपराओं, धार्मिक आस्था, कृषि जीवन और मौसम से जुड़े तर्कों पर आधारित है। खिचड़ी यहां केवल भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति, स्वास्थ्य और सामूहिक जीवन का प्रतीक बन चुकी है।
मकर संक्रांति को ‘खिचड़ी’ कहे जाने के प्रमुख कारण:
- मौसमी और कृषि महत्व: मकर संक्रांति के समय नई फसल का आगमन होता है। खेतों से ताजा चावल और दलहन प्राप्त होते हैं, जिनसे खिचड़ी बनाई जाती है। यह नई उपज, समृद्धि और अन्न के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक मानी जाती है।
- धार्मिक आस्था और देवताओं को अर्पण: उत्तर भारत में इस दिन भगवान सूर्य, भगवान विष्णु और स्थानीय देवताओं को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला खिचड़ी मेला इस धार्मिक परंपरा का प्रमुख उदाहरण है।
- स्वास्थ्य और मौसम से जुड़ा तर्क: जनवरी की ठंड में खिचड़ी को गर्म, पौष्टिक और सुपाच्य भोजन माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर को ऊर्जा देती है और ठंड में पाचन को संतुलित रखती है।
- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से खिचड़ी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। लोक परंपराओं में इस दिन खिचड़ी दान का उल्लेख मिलता है, जिसमें चावल, दाल, घी और मसालों का दान किया जाता है।
समय के साथ यह परंपरा इतनी गहराई से समाज में रच-बस गई कि मकर संक्रांति का नाम ही ‘खिचड़ी’ पड़ गया। गांवों और कस्बों में आज भी लोग कहते हैं—“आज खिचड़ी है”, जो इस सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।सामाजिक स्तर पर यह पर्व आपसी मेल-जोल और सामूहिकता को भी मजबूत करता है। परिवारों में खिचड़ी पकाई जाती है, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के बीच कच्चे सामान का आदान-प्रदान होता है और सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है।
यह परंपरा समाज में सहयोग, साझेदारी और समानता की भावना को प्रकट करती है। इस प्रकार उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति का ‘खिचड़ी’ कहलाना केवल एक नाम नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, कृषि जीवन, मौसम की समझ और सामाजिक संस्कृति का जीवंत प्रतिबिंब है। यह पर्व आज भी परंपरा और आधुनिक जीवन के बीच एक सशक्त सेतु बनकर खड़ा है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
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