Halda Festival : आधी रात को क्यों जलाई जाती हैं हजारों मशालें? जाने सदियों पुराने राज का रहस्य
हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में पारंपरिक 'हल्दा महोत्सव' का आगाज हो चुका है। धन की देवी शिशकर आपा को समर्पित यह पर्व अपनी भव्य मशालों और अग्नि प्रज्वलन समारोह के लिए प्रसिद्ध है। चंद्र और भागा नदियों के किनारे मनाया जाने वाला यह उत्सव लाहौली संस्कृति, पारंपरिक नृत्य और अटूट जनजातीय विश्वास का प्रतीक है। जानें कैसे माघ पूर्णिमा पर जलती मशालों से रोशन होती है हिमालय की ये वादियाँ।

Himachal Pradesh Lahaul valley Haldha festival celebration : जब कड़ाके की ठंड और बर्फ की सफेद चादर हिमालय के सुदूर इलाकों को अपने आगोश में ले लेती है, तब लाहौल की घाटियों में जलती हुई मशालें एक नई सुबह और समृद्धि का संदेश लेकर आती हैं। हिमाचल प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित और बहुप्रतीक्षित सांस्कृतिक आयोजनों में से एक, 'हल्दा महोत्सव' का आयोजन इस वर्ष भी पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ किया जा रहा है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि लामा धर्म की समृद्ध विरासत और आधुनिकता के बीच एक जीवंत पुल है, जहाँ लोग अपने अतीत को याद करते हुए आने वाले वर्ष की खुशहाली की सामूहिक प्रार्थना करते हैं।
इस महोत्सव का आध्यात्मिक केंद्र लामा धर्म में धन की देवी मानी जाने वाली 'शिशकर आपा' को समर्पित है। उत्सव का मुख्य आकर्षण वह भव्य अग्नि प्रज्वलन समारोह है, जो घाटी के कोने-कोने को रोशनी से सराबोर कर देता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, लामाओं द्वारा एक पवित्र स्थान का चयन किया जाता है, जहाँ समुदाय के लोग देवदार की जलती हुई टहनियों को लेकर एकत्र होते हैं। इन मशालों के मिलन से प्रज्वलित होने वाली विशाल अग्नि समूह की अटूट एकता का प्रतीक मानी जाती है। यह दृश्य विशेष रूप से केलांग की घाटियों और चंद्र एवं भागा नदियों के संगम तट पर अपनी अद्वितीय छटा बिखेरता है, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग पहुँचते हैं।
उत्सव का क्रम दो दिनों तक निरंतर जारी रहता है, जिसमें माघ पूर्णिमा का अवसर विशेष महत्व रखता है। यह पर्व आश्चर्यजनक रूप से रोशनी के त्योहार दिवाली की याद दिलाता है, लेकिन इसकी अपनी अनूठी पहाड़ी पहचान है। मशालों के खेल के बाद, स्थानीय परिधानों में सजे ग्रामीण मनमोहक नृत्य प्रदर्शन करते हैं और विशेष सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन किया जाता है। नगरवासियों के कल्याण और कृषि समृद्धि के लिए स्थानीय देवी-देवताओं को विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। यह महोत्सव लाहौल, केलांग और एकांत हिमालयी इलाकों के उस सांस्कृतिक समामेलन की प्रदर्शनी है, जो बाहरी दुनिया की चकाचौंध से दूर अपनी मौलिकता को आज भी संजोए हुए है।
हिमाचल प्रदेश के पर्यटन और सांस्कृतिक मानचित्र पर हल्दा महोत्सव का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह समय उन परिवारों के मिलन का भी होता है जो दुर्गम रास्तों और बर्फबारी के कारण महीनों एक-दूसरे से कटे रहते हैं। जैसे ही देवदार की टहनियों से उठी अग्नि की लपटें आसमान की ओर बढ़ती हैं, वह न केवल अंधेरे को चीरती हैं बल्कि लाहौल की जनजातीय संस्कृति की जीवंतता को भी रेखांकित करती हैं। यह समापन नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का प्रतीक है, जो हिमालय की दुर्गम चोटियों पर मानवीय विश्वास और सामूहिकता की विजय का उद्घोष करता है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
