मक्का की राह में 'आत्मनिर्भर' महिलाएं: न भाई, न शौहर- बिना महरम हज पर चलीं भारतीय बेटियां, तोड़ दीं सदियों पुरानी बेड़ियां
दिल्ली से 44 महिला श्रद्धालुओं का जत्था सऊदी अरब रवाना, इस्लाम में खून और दूध के रिश्तों से जुड़े महरम के नियमों का विस्तार से विश्लेषण।

हज 2026 के लिए दिल्ली से सऊदी अरब रवाना होतीं भारतीय मुस्लिम महिलाएं; इस्लाम के नियमों के तहत ये बिना महरम (पुरुष संरक्षक) के यात्रा कर रही हैं।
भारत के गौरवमयी इतिहास और आधुनिक होते समाज की एक नई तस्वीर उस वक्त सामने आई, जब दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से 44 मुस्लिम महिला श्रद्धालुओं का एक जत्था सऊदी अरब के लिए रवाना हुआ। यह सामान्य तीर्थयात्रा नहीं थी, बल्कि महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम था क्योंकि ये सभी महिलाएं 'बिना महरम' के हज की रस्में अदा करने के लिए मदीना जा रही हैं। सऊदी अरब में मई के अंत से शुरू होने वाली इस पवित्र यात्रा के लिए भारत से जाने वाला यह पहला जत्था है, जिसमें महिलाएं पूरी तरह आत्मनिर्भर होकर अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने निकली हैं।
इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र स्थल मक्का और मदीना की यात्रा हर मुसलमान के जीवन का सबसे बड़ा सपना होती है। पारंपरिक रूप से, महिलाओं के लिए इस यात्रा पर किसी 'महरम' यानी पुरुष संरक्षक के साथ होना अनिवार्य माना जाता रहा है। हालांकि, बदलते समय और नियमों के साथ अब भारत से 'लेडीज विदाउट महरम' (LWM) श्रेणी के तहत बड़ी संख्या में महिलाएं हज पर जा रही हैं। दिल्ली हज कमेटी की प्रमुख कौसर जहां ने इन महिला यात्रियों को हरी झंडी दिखाते हुए इसे एक ऐतिहासिक क्षण बताया। उनके अनुसार, बिना महरम के जाने वाली महिलाओं की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि भारतीय मुस्लिम महिलाएं अब अधिक आत्मविश्वासी और सशक्त हो रही हैं। सरकार और हज कमेटियों द्वारा सुरक्षा और सुविधाओं के पुख्ता इंतजाम ने महिलाओं के मन से अकेले यात्रा करने का भय समाप्त कर दिया है।
धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से 'महरम' शब्द की गहराई को समझना अत्यंत आवश्यक है। अरबी भाषा के शब्द 'हराम' से निकले इस शब्द का अर्थ 'वर्जित' होता है। इस्लाम में महरम वह व्यक्ति है जिससे किसी महिला का निकाह कभी नहीं हो सकता। वरिष्ठ जानकारों के अनुसार, महरम की मुख्य रूप से तीन श्रेणियां होती हैं। पहली श्रेणी खून के रिश्तों की है, जिसमें पिता, दादा, भाई, बेटा, पोता, चाचा और मामा जैसे करीबी सदस्य शामिल होते हैं। दूसरी श्रेणी दूध के रिश्ते की होती है, जिसमें वह व्यक्ति शामिल है जिसने एक ही महिला का दूध पिया हो। तीसरी श्रेणी विवाह के माध्यम से बनने वाले रिश्तों की होती है, जैसे ससुर या दामाद।
इन रिश्तों में 'स्थायी महरम' वे होते हैं जो जन्म या दूध के संबंध से जुड़े होते हैं, जबकि 'अस्थायी महरम' की श्रेणी में शौहर (पति) को रखा जाता है। पति को अस्थायी इसलिए माना जाता है क्योंकि निकाह से पहले वह गैर-महरम होता है और यदि निकाह टूट जाए, तो वह पुनः गैर-महरम की श्रेणी में आ जाता है। महरम का मुख्य उद्देश्य महिला की सुरक्षा और यात्रा के दौरान उसका अभिभावक बनना होता है। लेकिन आधुनिक दौर में अंतरराष्ट्रीय नियमों और सऊदी अरब सरकार द्वारा दी गई ढील के बाद, अब समूह में बिना महरम के भी महिलाएं सुरक्षित रूप से अपनी इबादत पूरी कर सकती हैं।
आंकड़ों की बात करें तो इस बार दिल्ली से रवाना हुए जत्थे में केवल दिल्ली की ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड की महिलाएं भी शामिल हैं। दिल्ली हज कमेटी के अनुसार, अब तक कुल 2721 यात्री सऊदी अरब भेजे जा चुके हैं, जिनमें से 1298 महिलाएं हैं। आने वाले दिनों में कुल 21,100 से अधिक तीर्थयात्री 54 अलग-अलग उड़ानों के जरिए इस पाक सफर पर जाएंगे। यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि उन रूढ़ियों को तोड़ने का भी जरिया बन रही है जो महिलाओं की गतिशीलता को सीमित करती थीं। आज की मुस्लिम महिला अपनी आस्था और अपनी पहचान दोनों को बखूबी संभालना जानती है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
