Guru Ravidas Jayanti : आखिर क्यों माघ पूर्णिमाको ही मानते है गुरु रविदास जी की जयंती ? जाने स्पेशल रिपोर्ट
वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में धूमधाम से मनाई जा रही है गुरु रविदास जयंती। माघ पूर्णिमा के अवसर पर लाखों श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान कर अमृतवाणी का पाठ किया। 1377 ईस्वी में जन्मे इस महान संत ने जातिवाद के विरुद्ध संघर्ष कर भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी। जानिए सीर गोवर्धनपुर में उमड़े जनसैलाब, नगर कीर्तन और गुरु रविदास जी के क्रांतिकारी जीवन दर्शन की पूरी रिपोर्ट।

Guru Ravidas Jayanti 2026 : उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी काशी के सीर गोवर्धनपुर की गलियां आज 'जो बोले सो निर्भय' के जयकारों और 'अमृतवाणी' के पाठ से गुंजायमान हैं। अवसर है—माघ पूर्णिमा, जो न केवल चंद्रमा की पूर्णता का प्रतीक है, बल्कि मानवता के महान पथप्रदर्शक संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की जयंती का भी साक्षी है। दुनिया भर से आए लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस ऐतिहासिक गांव को एक वैश्विक केंद्र बिंदु बना दिया है, जहाँ जाति, वर्ण और पंथ की सीमाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
आस्था का अनुष्ठान: गंगा स्नान से कीर्तन जुलूस तक
रविदास जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का वार्षिक उत्सव है। आज के दिन के मुख्य घटनाक्रम इस प्रकार हैं:
- पवित्र डुबकी और पूजन: ब्रह्म मुहूर्त में लाखों श्रद्धालुओं ने गंगा के पावन तटों पर डुबकी लगाकर गुरु की छवि का पूजन किया।
- अमृतवाणी पाठ: सीर गोवर्धनपुर स्थित भव्य मंदिर में गुरु रविदास जी की शिक्षाओं 'अमृतवाणी' का निरंतर पाठ किया जा रहा है, जो श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति और समानता का संदेश देता है।
- नगर कीर्तन: वाराणसी की सड़कों पर भव्य 'नगर कीर्तन' (संगीत जुलूस) निकाला जा रहा है, जिसमें गुरु के चित्र को सुसज्जित पालकी में रखा गया है। विभिन्न वाद्ययंत्रों और धार्मिक भजनों के साथ यह जुलूस समाज को एकजुटता का संदेश दे रहा है।
विरासत: 1377 से आज तक का आध्यात्मिक सफर
1377 ईस्वी में सीर गोवर्धन के एक साधारण चर्मकार परिवार में जन्मे रविदास जी ने यह सिद्ध किया कि ईश्वरीय ज्ञान पर किसी विशेष वर्ग का एकाधिकार नहीं है। पिता रघु श्री और माता घुरबिनिया के आंगन में पले-बढ़े इस संत ने बचपन से ही साधु-संगत को अपनाया। उनकी स्वाभाविक आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता ने उस काल के अंधविश्वास और जातिवाद पर प्रहार किया। 2025 में 12 फरवरी को मनाई गई इस जयंती के बाद, 2026 में माघ पूर्णिमा का यह अवसर एक बार फिर दुनिया को उनके दर्शन की याद दिला रहा है।
वैश्विक महत्व और समन्वय :
रविदास जयंती का महत्व केवल रैदास पंथ तक सीमित नहीं है। कबीरपंथियों, सिखों और अन्य संप्रदायों के लोगों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि गुरु रविदास जी भक्ति आंदोलन के एक ऐसे सेतु थे, जिन्होंने कबीर दास जी के साथ मिलकर एक नई चेतना का संचार किया। उनकी शिक्षाएं आज भी दुनिया भर में मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय का आधार मानी जाती हैं। वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर मंदिर में उमड़ता जनसैलाब इस बात का प्रमाण है कि 600 वर्षों के बाद भी गुरु रविदास जी की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। उनकी जयंती हमें याद दिलाती है कि यदि हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम और मन में शुद्धता है, तो मनुष्य अपनी परिस्थितियों से ऊपर उठकर महापुरुष बन सकता है। यह

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
