Guru Ravidas Jayanti : आखिर रविदास जी कैसे बने 'संत शिरोमणि'? जानिए अनसुनी कहानी
Guru Ravidas Jayanti 2026: 1 फरवरी को माघ पूर्णिमा के अवसर पर मनाई जा रही है संत शिरोमणि गुरु रविदास की जयंती। जानिए कैसे एक साधारण परिवार में जन्मे रविदास जी ने अपनी भक्ति और 'कर्म ही पूजा' के दर्शन से सामाजिक भेदभाव को मिटाया और 'संत शिरोमणि' कहलाए। भक्ति आंदोलन के इस महान संत के इतिहास, जन्म विवाद और गुरु ग्रंथ साहिब में उनके योगदान पर विशेष कवरेज।

Guru Ravidas Jayanti 2026 : जब-जब भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण और सामाजिक समरसता का इतिहास लिखा जाएगा, संत शिरोमणि गुरु रविदास जी का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित होगा। आज, 1 फरवरी 2026 को संपूर्ण राष्ट्र माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर इस महान क्रांतिकारी संत की जयंती मना रहा है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस विचारधारा का उत्सव है जिसने मध्यकाल की कुरीतियों और जातिगत भेदभाव की दीवारों को अपनी भक्ति की शक्ति से ढहा दिया था।
माघ पूर्णिमा और संत रविदास: एक दैवीय संयोग
हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ पूर्णिमा का दिन आध्यात्मिक शुद्धि के लिए सर्वोच्च माना जाता है। इसी पावन तिथि पर वाराणसी के मंधुदेव (मांडुआरडीह) में गुरु रविदास जी का प्राकट्य हुआ। हालांकि इतिहासकारों के बीच उनके जन्म वर्ष (1377 ई. बनाम 1399 ई.) को लेकर शोध का विषय बना रहता है, लेकिन उनकी शिक्षाओं की प्रासंगिकता पर कोई संशय नहीं है। 2026 में यह जयंती रविवार के दिन पड़ रही है, जिसे लेकर देश भर के रविदासिया समुदायों और मंदिरों में भारी उत्साह देखा जा रहा है।
एक साधारण चर्मकार से 'संत शिरोमणि' बनने का सफर :
रविदास जी का 'संत शिरोमणि' (संतों में श्रेष्ठ) बनने का सफर आत्म-सम्मान और अटूट विश्वास की एक अद्वितीय गाथा है। उनके इस परिवर्तन के प्रमुख पड़ाव निम्नलिखित हैं:
- कर्म ही पूजा: एक साधारण परिवार में जन्मे रविदास जी ने जूते बनाने के अपने पैतृक कार्य को कभी छोटा नहीं समझा। उन्होंने संदेश दिया कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म की शुद्धता से मिलती है।
- अहिंसक क्रांति: उस दौर में जब जातिवाद चरम पर था, उन्होंने हिंसा के बजाय मधुर वाणी और तर्क से समाज का हृदय परिवर्तन किया।
- व्यापक स्वीकार्यता: उनके भक्ति गीतों और छंदों का प्रभाव इतना गहरा था कि वे केवल एक वर्ग के नहीं, बल्कि पूरे समाज के मार्गदर्शक बन गए। चित्तौड़ की रानी मीराबाई जैसी महान विभूतियों ने उन्हें अपना गुरु मानकर उनकी श्रेष्ठता पर मुहर लगाई।
भक्ति आंदोलन पर स्थाई प्रभाव :
भक्ति आंदोलन के दौरान गुरु रविदास ने ईश्वर की भक्ति को मंदिरों की चारदीवारी से निकालकर आम आदमी के 'कठौते' (बर्तन) तक पहुँचाया। उनके 41 पदों का सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में संकलन इस बात का प्रमाण है कि उनका आध्यात्मिक स्तर कितना ऊँचा था। उन्होंने स्पष्ट किया कि "सच्ची भक्ति कर्म और आचरण से होती है, जाति और कुल से नहीं।"

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
