इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण पर्वों में से एक ईद-उल-अज़हा, जिसे बकरीद या “कुर्बानी का त्योहार” भी कहा जाता है, वर्ष 2026 में वैश्विक स्तर पर गहरी धार्मिक आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। यह पर्व इस्लाम के दो प्रमुख ईदों में से एक माना जाता है और हज यात्रा के समापन के बाद अल्लाह के प्रति समर्पण, त्याग और मानवता के संदेश को पुनः जीवंत करता है। यह त्योहार पैगंबर इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की अटूट आस्था और अल्लाह के आदेशों के प्रति उनकी पूर्ण निष्ठा की ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसे आज भी मुसलमान “कुर्बानी” के रूप में याद करते हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ईद-उल-अज़हा का शुभारंभ मंगलवार, 26 मई 2026 की शाम से होगा, जबकि ईद का मुख्य दिन बुधवार, 27 मई 2026 को मनाया जाएगा। इसके बाद तीन दिनों तक चलने वाले इस पवित्र पर्व का समापन शुक्रवार, 29 मई 2026 को होगा।

ईद के दिन सुबह सूर्योदय के कुछ समय बाद विशेष ईद की नमाज़ अदा की जाती है, जिसे इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। यह नमाज़ दो रकअतों पर आधारित होती है, जिसमें अतिरिक्त तकबीरें कही जाती हैं। विभिन्न इस्लामिक मतों (मज़हब) के अनुसार तकबीरों की संख्या में भिन्नता हो सकती है, और इसे इमाम के मार्गदर्शन में अदा किया जाता है। नमाज़ से पहले ग़ुस्ल करना, अच्छे वस्त्र धारण करना और ईद की तकबीरें पढ़ते हुए मस्जिद की ओर जाना सुन्नत माना गया है। नमाज़ के बाद खुत्बा (धार्मिक उपदेश) दिया जाता है, जिसे सुनना अनिवार्य शिष्टाचार का हिस्सा माना जाता है।

ईद-उल-अज़हा की तैयारियाँ भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। मुसलमान इस अवसर पर पहले से ही कुर्बानी की व्यवस्था करते हैं, ताकि समय पर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हो सके और जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाई जा सके। इसके साथ ही, दुल-हिज्जा के पहले दस दिनों को अत्यंत पवित्र माना जाता है, जिसमें इबादत, दान और अल्लाह की याद को विशेष महत्व दिया जाता है। इस अवधि को आत्मिक शुद्धि और भक्ति का सर्वोत्तम समय माना गया है।

ईद के सामाजिक और सामुदायिक पहलू भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। लोग अपने परिवार, पड़ोसियों और समुदाय के साथ मिलकर इस पर्व को साझा करते हैं, जिससे सामाजिक एकता और भाईचारे की भावना मजबूत होती है। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पड़ोसियों के सम्मान और सामाजिक सौहार्द को इस अवसर पर विशेष महत्व देने की शिक्षा दी है। ऐतिहासिक रूप से भी यह उल्लेख मिलता है कि ईद के अवसर पर कुर्बानी के मांस का वितरण और साझा भोजन की परंपरा को बढ़ावा दिया जाता था, जिससे समाज में समानता और सहयोग की भावना विकसित होती थी।

हालांकि उपलब्ध विवरण में एक कथन के अनुसार हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से संबंधित एक रिवायत का उल्लेख अधूरा मिलता है, लेकिन इसका मूल संदेश ईद-उल-अज़हा की धार्मिक भावना और पैगंबर की शिक्षाओं के अनुरूप कुर्बानी और आस्था की परंपरा को ही दर्शाता है। ईद-उल-अज़हा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह त्याग, आस्था और सामाजिक एकता का गहरा संदेश भी देता है, जो आज के समय में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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