दीपावली, जिसे संस्कृत में दीपावलिः कहा जाता है, उत्तरी गोलार्ध की शरद ऋतु में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला एक पौराणिक और धार्मिक उत्सव है। यह कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है और भारत के सबसे बड़े, प्रमुख और सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, जो जीवन में ज्ञान, समृद्धि और उजाले का संदेश देता है।

प्राचीन काल से ही दीपावली को विक्रम संवत के कार्तिक माह में गर्मी की फसल के बाद मनाने की परंपरा रही है। यह पर्व न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का प्रतीक है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी लोगों को एक साथ जोड़ने वाला अवसर है। पुराणों में भी दीपावली का उल्लेख मिलता है। पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में दीयों को सूर्य के जीवनदायी प्रकाश का प्रतिनिधि बताया गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार, दीपक सूर्य के हिस्सों का प्रतीक हैं, जो कार्तिक माह में अपनी स्थिति बदलते हैं और जीवन में ऊर्जा का संचार करते हैं।

कुछ क्षेत्रों में दीपावली को यम और नचिकेता की कथा से भी जोड़ा जाता है। उपनिषदों में वर्णित नचिकेता की कथा सही और गलत, ज्ञान और अज्ञान, सच्चे और क्षणिक धन के बीच का अंतर बताती है। यह कथा पहली सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व की उपनिषदों में दर्ज है।

रामायण के अनुसार, दीपावली का एक प्रमुख ऐतिहासिक संदर्भ श्री रामचन्द्रजी से जुड़ा है। माना जाता है कि रामचन्द्रजी ने माता सीता को रावण की कैद से छुड़ाया और उनकी अग्नि परीक्षा के बाद 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे। अयोध्यावासियों ने उनका स्वागत दीपों से जगमग कर किया, तभी से दीपों का पर्व, यानी दीपावली, मनाने की परंपरा स्थापित हुई।

सातवीं शताब्दी में संस्कृत नाटक “नागनंद” में राजा हर्ष ने इसे दीपप्रतिपादुत्सवः के रूप में उल्लेखित किया, जिसमें दीयों की रौशनी और नववर-वधू को उपहार देने की परंपरा बताई गई। नौवीं शताब्दी में कवि राजशेखर ने इसे दीपमालिका कहा, जिसमें घरों और बाजारों की पुताई कर तेल के दीयों से रात में सजाया जाता था।

ग्यारहवीं शताब्दी में फारसी यात्री और इतिहासकार अल-बेरूनी ने अपने संस्मरणों में दीपावली का उल्लेख किया और इसे कार्तिक मास की अमावस्या पर हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाला त्योहार बताया। परंपरा के अनुसार चौकी पर लाल कपड़ा बिछाया जाता है, जिस पर गणेश जी और लक्ष्मी माता की मूर्तियाँ रखी जाती हैं। लक्ष्मी माता की मूर्ति को दाहिनी ओर और गणेश जी को बाईं ओर रखा जाता है, दोनों का चेहरा पूर्व-पश्चिम दिशा की ओर होता है। पूजा सामग्री में सोने-चांदी के आभूषण और पांच चांदी के सिक्के रखे जाते हैं, जिन्हें कुबेर का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा कलश में जल, चंदन, दूर्वा, पंचरत्न, सुपारी, आम या केले के पत्ते और मौली बांधा हुआ नारियल रखा जाता है। पूजा की चौकी के सामने थाली में आवश्यक सामग्री रखी जाती है, दो बड़े दीयों में देसी घी और ग्यारह छोटे दीयों में सरसों का तेल भरा जाता है। यह सभी अनुष्ठान शुभ मुहूर्त से पहले पूर्ण करने का विधान है।

दीपावली न केवल धार्मिक महत्त्व रखती है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी उत्सवों में समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह पर्व परिवारों, समाज और समुदाय को एकजुट करने का प्रतीक है और भारत के सांस्कृतिक इतिहास में इसकी गहरी पहचान है।

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Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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