कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ महापर्व, भारतीय परंपरा और संस्कृति का एक अनमोल प्रतीक है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बड़े श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। सूर्योपासना का यह लोकपर्व मैथिल, मगही और भोजपुरी समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और उनकी संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है।

बिहार में छठ पर्व का आयोजन विशेष धूमधाम और अनुशासन के साथ किया जाता है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि वैदिक काल से चली आ रही परंपरा का जीवंत प्रमाण भी है। ऋग्वेद में वर्णित सूर्य पूजन और उषा पूजन के अनुसार यह पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। भैयादूज के तीसरे दिन से शुरू होकर पहले दिन सेंधा नमक, घी से बना अरवा चावल और कद्दू की सब्जी के रूप में प्रसाद ग्रहण किया जाता है। दूसरे दिन व्रत शुरू होता है, जिसमें व्रती दिनभर अन्न और जल का त्याग करते हैं। शाम के समय खीर बनाकर पूजा करने के उपरांत प्रसाद ग्रहण किया जाता है, जिसे 'खरना' कहा जाता है। तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है और अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य चढ़ाकर पूजा संपन्न होती है। पूजा के दौरान पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है; लहसुन और प्याज वर्जित होते हैं।

छठ महापर्व इस वर्ष 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है, जिसकी शुरुआत नहाए-खाए से होती है। छठ पूजा में पारंपरिक गीतों के माध्यम से भक्ति भाव व्यक्त किया जाता है और प्रसाद वितरण के साथ पर्व का समापन होता है। बिहार में इस पर्व को केवल हिंदू ही नहीं बल्कि अन्य धर्मावलंबी, विशेषकर मुस्लिम समुदाय के लोग भी श्रद्धा के साथ मनाते देखे जाते हैं।

इस उत्सव की वैश्विक पहुंच भी बढ़ रही है। प्रवासी भारतीय विश्वभर में इसे अपने समुदाय और संस्कृति के प्रतीक के रूप में मनाते हैं। छठ पूजा प्रकृति, सूर्य, जल और वायु के तत्वों के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है। इसे मिथिला में रनबे माय, भोजपुरी में सबिता माई और बंगाली में रनबे ठाकुर के नाम से भी पूजा जाता है। परंपरा के अनुसार, पर्व के दौरान मुख्य उपासक यानी ‘व्रतिनी’ प्रायः महिलाएं होती हैं, हालांकि पुरुष भी इसमें भाग लेते हैं।

त्यौहार के अनुष्ठान अत्यंत कठोर और अनुशासित होते हैं। इसमें पवित्र स्नान, उपवास, लंबे समय तक पानी में खड़े रहना, प्रसाद और अर्घ्य अर्पित करना शामिल हैं। मिथिला में महिलाएं छठ के अवसर पर पारंपरिक शुद्ध सूती धोती पहनती हैं, जो उनकी संस्कृति और परंपरा की पहचान है। पर्यावरणविदों के अनुसार छठ महापर्व हिंदू त्योहारों में सबसे पर्यावरण-अनुकूल पर्व है।

इस प्रकार, छठ महापर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी सशक्त संदेश देता है। यह पर्व बिहार, मिथिला और अन्य क्षेत्रों की संस्कृति और परंपरा को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका महत्व और आदर्श कायम रखता है।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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