बॉम्बे हाई कोर्ट ने धर्मांतरण से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को अपना धर्म बदलने के लिए प्रेरित करना अपने आप में उसकी धार्मिक आस्था का अपमान नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का उद्देश्य अपने धर्म को साझा करना है और किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है, तो इसे धर्म का अपमान नहीं माना जा सकता। जस्टिस एम. डब्ल्यू. चांदवानी ने यह टिप्पणी एक जोड़े को हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के लिए कथित तौर पर दबाव डालने के मामले में की।

मामले में चार लोगों पर एक जोड़े को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने और दबाव डालने का आरोप लगा था। आरोपियों में वरिष्ठ नागरिक जोसेफ खुडावंत, उनके परिवार के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अनंत मानकर शामिल थे। आरोप था कि इन लोगों ने वर्ष 2025 में जोड़े को धर्म परिवर्तन के लिए आर्थिक सहायता देने की पेशकश की थी।

यह घटना महाराष्ट्र में पिछले साल अगस्त में नए प्रलोभन-विरोधी कानून के लागू होने से पहले की है। मामले की सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरोपों और संबंधित परिस्थितियों पर विचार किया। जस्टिस एम. डब्ल्यू. चांदवानी ने कहा कि संबंधित लोग अपना धर्म साझा कर रहे थे और उनका उद्देश्य किसी अन्य धर्म का अपमान करना नहीं था। अदालत के अनुसार, इस मामले में किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आधार नहीं बनता।

अदालत ने इस निष्कर्ष के आधार पर चारों आरोपियों के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप हटा दिए। इस फैसले में धर्म साझा करने, धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने और धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के बीच अंतर को लेकर अदालत की टिप्पणी सामने आई है।

Pratahkal Bureau

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