धार की भोजशाला: सदियों पुराना इतिहास और आस्था के बीच उलझा 'सरस्वती सदन' का विवाद
धार की ऐतिहासिक भोजशाला: राजा भोज द्वारा निर्मित ज्ञान के मंदिर से लेकर वर्तमान विवाद तक की पूरी कहानी। जानिए क्यों यहाँ हिंदू मंगलवार को पूजा और मुस्लिम शुक्रवार को नमाज़ पढ़ते हैं। ASI सर्वे और कानूनी लड़ाई के बीच उलझे सरस्वती मंदिर और कमाल मौला मस्जिद के इतिहास और वर्तमान स्थिति पर एक विशेष रिपोर्ट।

धार, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक 'भोजशाला' केवल एक प्राचीन इमारत नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, स्थापत्य कला और धार्मिक संवेदनशीलता का एक ऐसा केंद्र है, जो दशकों से चर्चा और विवादों के केंद्र में रहा है। राजा भोज की विरासत और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के इस 'सदन' में आज भी आस्था और परंपराओं का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है, जहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों की धार्मिक मान्यताएं एक ही प्रांगण में आकर टकराती हैं।
गौरवशाली इतिहास: जब भोजशाला थी ज्ञान का शिखर
भोजशाला का निर्माण 11वीं शताब्दी (लगभग 1034 ईस्वी) में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज द्वारा करवाया गया था। राजा भोज स्वयं एक महान विद्वान और कला प्रेमी थे, जिन्होंने इसे संस्कृत अध्ययन के एक प्रमुख केंद्र और 'वाग्देवी' (देवी सरस्वती) के मंदिर के रूप में स्थापित किया था।
- स्थापत्य कला: इस परिसर की दीवारों पर संस्कृत के व्याकरण और काव्य खुदे हुए हैं, जो इसके शैक्षणिक महत्व को दर्शाते हैं।
- वाग्देवी की प्रतिमा: इतिहासकार बताते हैं कि यहाँ कभी माँ सरस्वती की एक अत्यंत सुंदर प्रतिमा स्थापित थी, जिसे वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखा गया है।
- इबादतगाह में परिवर्तन: ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार, 14वीं और 15वीं शताब्दी के दौरान अलाउद्दीन खिलजी और बाद में महमूद खिलजी के शासनकाल में इस परिसर के कुछ हिस्सों को मस्जिद (कमाल मौला मस्जिद) के रूप में परिवर्तित किया गया।
एक प्रांगण, दो मान्यताएं: विवाद की जड़ें
भोजशाला का मौजूदा स्वरूप भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। यहाँ की सबसे अनूठी और विवादास्पद व्यवस्था यह है कि एक ही छत के नीचे हिंदू और मुस्लिम दोनों को पूजा और इबादत का अधिकार प्राप्त है।
- मंगलवार की पूजा: हिंदू समुदाय के लोग हर मंगलवार को यहाँ देवी सरस्वती की पूजा और 'हनुमान चालीसा' का पाठ करते हैं।
- शुक्रवार की नमाज़: मुस्लिम समुदाय के लोगों को हर शुक्रवार को परिसर में नमाज़ अदा करने की अनुमति है।
- बसंत पंचमी का टकराव: विवाद तब गहरा जाता है जब बसंत पंचमी (सरस्वती पूजा का दिन) शुक्रवार को पड़ जाती है। ऐसी स्थिति में दोनों पक्षों द्वारा पूरे दिन अधिकार जताने को लेकर अक्सर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
कानूनी और आधिकारिक पक्ष
यह मामला दशकों से अदालत की दहलीज पर है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह पूर्णतः एक मंदिर है और इसके गर्भगृह से लेकर खंभों तक पर हिंदू देवी-देवताओं के चिह्न मौजूद हैं। वहीं, मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानते हुए यथास्थिति बनाए रखने की दलील देता है।
- ASI का 2003 का आदेश: वर्तमान व्यवस्था ASI के 7 अप्रैल 2003 के आदेश पर आधारित है, जिसने पूजा और नमाज़ के दिनों का निर्धारण किया था।
- हालिया सर्वे: 2024 में माननीय उच्च न्यायालय के आदेश पर ASI ने ज्ञानवापी की तर्ज पर यहाँ एक वैज्ञानिक सर्वे (Scientific Survey) किया है, जिसकी रिपोर्ट भविष्य में इस स्थल के मूल स्वरूप को लेकर निर्णायक साबित हो सकती है।
समाधान की प्रतीक्षा में विरासत
भोजशाला का विवाद केवल जमीन के एक टुकड़े का नहीं, बल्कि पहचान और इतिहास के पुनर्लेखन की जद्दोजहद है। जहाँ एक ओर यह साझा संस्कृति का उदाहरण हो सकता था, वहीं आज यह धार्मिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण का केंद्र बन चुका है। आने वाले समय में न्यायालय का फैसला और ASI की वैज्ञानिक रिपोर्ट ही यह तय करेगी कि राजा भोज की यह विरासत केवल विवादों की गूँज बनकर रहेगी या इसे अपना खोया हुआ गौरवपूर्ण स्वरूप वापस मिलेगा।

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