ईश्वर को प्राप्त करना चाहते हो, अपनी आत्मा को जगाओ...— आचार्य रविशेखर सूरीश्वर म. सा.
मुंबई प्रवास पर आचार्य श्रीमद विजय रविशेखर सूरीश्वर जी म.सा. ने 'दैनिक प्रातःकाल' से वार्ता में आध्यात्मिक चेतना और आत्म-जागरण को शांति का एकमात्र मार्ग बताया। उन्होंने कलयुग के प्रभाव, गुरु-शिष्य परंपरा के क्षरण और भौतिकता के जाल पर चिंता व्यक्त करते हुए भगवान महावीर के दर्शन और आत्म-शुद्धि के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का दिव्य संदेश दिया।

मुंबई। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ मनुष्य भौतिकता की अंधी दौड़ और कृत्रिम सुख-सुविधाओं के मायाजाल में पूरी तरह उलझ गया है, वहाँ आध्यात्मिक चेतना का पुनर्जागरण ही शांति का एकमात्र विकल्प बनकर उभरा है। मुंबई प्रवास पर आए हिमाचल सुरि मेवाड़ गुरू जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा के आचार्य श्रीमद विजय रविशेखर सूरीश्वर जी महाराज साहब ने 'दैनिक प्रातःकाल' के संवाददाता मनीष पालीवाल के साथ एक विशेष वार्ता के दौरान समाज के नाम अत्यंत गंभीर संदेश दिया। आचार्यश्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्तमान समय में कलयुग का प्रभाव अपनी चरम सीमा पर है, जिसके परिणामस्वरूप मानवीय मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है और मनुष्य धर्म के वास्तविक मर्म से विमुख होकर अपने आचरण में गिरावट ला रहा है। उन्होंने जीवन के गूढ़ रहस्य का प्रतिपादन करते हुए कहा कि यदि सच्चे अर्थों में ईश्वर की प्राप्ति करनी है, तो सबसे पहले अपनी सोई हुई आत्मा को जगाना अनिवार्य है।
आचार्यश्री के विश्लेषण के अनुसार, आधुनिक युग का मनुष्य बाहरी आकर्षणों, पद-प्रतिष्ठा और धन-संपत्ति के संचय में इतना अधिक व्यस्त हो चुका है कि वह अपने भीतर विद्यमान असीम शांति, शाश्वत सत्य और चैतन्य स्वरूप को पूरी तरह बिसरा बैठा है। इसी विस्मृति के कारण ही आज समाज में अशांति, असंतोष, आपसी कटुता और मानसिक तनाव का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मा का जागरण ही वह दिव्य मार्ग है, जो मनुष्य को क्षणिक सुखों से ऊपर उठाकर वास्तविक आनंद, संतोष और साक्षात ईश्वर के सान्निध्य तक पहुँचाने की सामर्थ्य रखता है। उन्होंने बताया कि आत्मा को जगाना कोई बाह्य प्रदर्शन, आडंबर या केवल वेशभूषा का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत सूक्ष्म और निरंतर चलने वाली आंतरिक साधना है। इस पथ पर अग्रसर होने के लिए वैचारिक निर्मलता, मानसिक शांति, व्यवहार में गंभीरता और अंतःकरण की पवित्रता को आत्मसात करना आवश्यक है। जब मन के उद्वेग शांत होते हैं और विचार विकारों से मुक्त होते हैं, तभी आत्मा का वास्तविक दिव्य स्वरूप प्रकट होता है, जो साधक को आध्यात्मिक उन्नति के शिखर की ओर ले जाता है।
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के दर्शन को उद्धृत करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि प्रत्येक जीव में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और अनंत शक्ति विद्यमान है, किंतु जन्म-जन्मांतर के कर्मों के बंधन ने इस प्रकाश को ढक लिया है। जिस प्रकार बादलों के हटते ही सूर्य अपनी पूरी आभा के साथ चमकने लगता है, ठीक उसी प्रकार जब मनुष्य क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और अहंकार जैसे विकारों पर विजय प्राप्त कर लेता है, तब उसकी आत्मा अपने शुद्ध, बुद्ध और निरावरण स्वरूप में प्रकट होती है। यही आत्म-शुद्धि मोक्ष का वास्तविक मार्ग है। जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा की विशिष्टता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जिनालयों में विराजित तीर्थंकरों की प्रतिमाएं केवल पाषाण या धातु की कलाकृतियां नहीं, बल्कि वे परम वैराग्य, वीतरागता और सम्यक दर्शन का जीवंत आलंबन हैं, जिनके माध्यम से भक्त अपनी श्रद्धा और एकाग्रता का अभ्यास करता है।
संवाद के दौरान आचार्यश्री ने अपने गुरुदेव आचार्य हिमाचलसूरीश्वर जी महाराज साहब के साथ व्यतीत किए गए स्वर्णिम काल को अत्यंत भावुकता और श्रद्धा के साथ स्मरण किया। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर बल देते हुए कहा कि उस दौर में समर्पण अद्वितीय था और गुरु का आदेश ही शिष्य के लिए सर्वोपरि धर्म होता था। तत्कालीन साधक व्यक्तिगत इच्छाओं से अधिक गुरु आज्ञा और सामाजिक कल्याण को महत्व देते थे, जिसकी बदौलत समाज को मजबूत संस्कार प्राप्त हुए। वर्तमान सामाजिक परिवेश में आ रही गिरावट पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि आज धार्मिक जीवन में भी भौतिकता का प्रवेश हो गया है और संबंधों की वह पुरानी गहराई कम होती दिखाई दे रही है। उन्होंने आगाह किया कि आधुनिकता की दौड़ में हमें अपनी मूल परंपराओं और जड़ों को नहीं भूलना चाहिए।
मार्गदर्शन देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य का उत्तरदायित्व केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी समय निकालना होगा। 'जीओ और जीने दो' के सिद्धांत को व्यवहार में उतारना और हर जीव के प्रति दयाभाव रखना ही मानवता का मूल स्वरूप है। उन्होंने साधारण गृहस्थों के लिए मौन, आत्मचिंतन, ध्यान, वाणी में मधुरता, क्षमा भाव, अहिंसा का सूक्ष्म पालन, अपरिग्रह, सत्संग, निस्वार्थ सेवा और सात्विक आहार जैसे सरल आध्यात्मिक उपाय बताए, जो आत्मा पर जमी कर्मों की धूल को साफ करने में सक्षम हैं। अंत में उन्होंने मंगल संदेश दिया कि आत्मा का जागरण ही सच्चा धर्म और ईश्वर प्राप्ति का सुनिश्चित मार्ग है। यदि हम गुरु-शिष्य परंपरा के मूल्यों को आधार बनाएं, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन पवित्र और तनावमुक्त बनेगा, बल्कि हम संपूर्ण मानवता के कल्याण में सहभागी बनकर ईश्वर के निकट पहुँच सकेंगे।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
