सभी महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूं: श्रीकृष्ण का स्वरूप है हिन्दी पंचांग का नौवां महीना
हिन्दी पंचांग का नौवां महीना मार्गशीर्ष श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। इस पवित्र माह में दान, जप, तप और यमुना स्नान से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है— “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्”। जानिए इस महीने का धार्मिक महत्व, पूजा विधि और पारंपरिक मान्यताएं।

हिन्दी पंचांग का नौवां महीना मार्गशीर्ष — जिसे अगहन भी कहा जाता है — गुरुवार से प्रारंभ हो गया है। यह पवित्र मास 4 दिसंबर तक रहेगा। श्रीकृष्ण भक्तों के लिए यह महीना अत्यंत विशेष है, क्योंकि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में अर्जुन से कहा था — “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्”, अर्थात् “सभी महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूं।” यही कारण है कि यह महीना श्रीकृष्ण के स्वरूप के रूप में पूजनीय माना जाता है।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित मनीष शर्मा के अनुसार, हिन्दी पंचांग के प्रत्येक महीने का नाम उस नक्षत्र पर आधारित होता है, जो महीने की पूर्णिमा तिथि पर पड़ता है। मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा पर मृगशिरा नक्षत्र होता है, जिसे संस्कृत में मार्गशीर्ष कहा जाता है। इसीलिए इस महीने का नाम मार्गशीर्ष पड़ा। इसे अगहन भी कहा जाता है। यह महीना प्रायः अंग्रेजी कैलेंडर के नवंबर और दिसंबर के मध्य आता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मार्गशीर्ष मास में किए गए दान, जप, तप, स्नान और पूजा से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। कहा गया है कि इस माह में यमुना नदी में स्नान करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जब वृंदावन की गोपियां श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करने के लिए तप कर रही थीं, तब स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा था कि मार्गशीर्ष मास में यमुना स्नान करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसीलिए आज भी इस महीने में यमुना स्नान की परंपरा जीवित है।
धर्मग्रंथों में बताया गया है कि इस महीने में प्रातःकाल स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। इसके लिए तांबे के लोटे में जल के साथ कुमकुम, चावल और फूल डालकर “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र का जाप करते हुए सूर्य देव को अर्पण किया जाता है। इस मास में तिल-गुड़, अन्न, वस्त्र और गौदान का विशेष महत्व है। जरूरतमंदों को भोजन कराने से पितृदेव प्रसन्न होते हैं, ऐसी मान्यता है।
मार्गशीर्ष माह में भगवान श्रीकृष्ण की बालकृष्ण या बालगोपाल रूप में पूजा करना विशेष फलदायी माना गया है। इससे व्यक्ति को आनंद, समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। पूजा विधि में प्रातः स्नान के बाद भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह का दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक किया जाता है। केसर मिश्रित दूध या पंचामृत से स्नान कराकर भगवान को पीले वस्त्र, तुलसी दल और माखन-मिश्री का भोग लगाया जाता है। इसके बाद “क्लीं कृष्णाय नमः” मंत्र का जाप और आरती कर प्रसाद वितरित किया जाता है।
मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन और गोकुल जैसे श्रीकृष्ण तीर्थ स्थलों की यात्रा का भी इस महीने में विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति मार्गशीर्ष मास में मथुरा में यमुना स्नान करता है, उसके समस्त पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं। इस महीने में भगवद्गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम और गोविंद स्तोत्र का पाठ करने से आध्यात्मिक उन्नति और दिव्य शांति की अनुभूति होती है।
इस प्रकार मार्गशीर्ष केवल एक मास नहीं, बल्कि भक्ति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण वह काल है, जब भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप में समय स्वयं भक्तों को पुण्य, शांति और कल्याण की दिशा में अग्रसर करता है।
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