वरदा चतुर्थी पर मिल सकती है सुख-समृद्धि ; ऐसे करें व्रत और जानें पूजा का सही तरीका
अधिक मास शुक्ल चतुर्थी 2026 पर वरदा चतुर्थी का विशेष संयोग 20 मई को पड़ रहा है। इस दिन गणेश पूजन, व्रत विधि, चतुर्थी तिथि का समय, वर्जित चन्द्रदर्शन काल और धार्मिक महत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह पर्व आत्मबल, शांति और समृद्धि प्रदान करने वाला माना जाता है।

अधिक मास वरदा चतुर्थी
हिंदू पंचांग में समय की गणना बारह मासों के आधार पर की जाती है, लेकिन जब सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर उत्पन्न होता है, तो उस अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह मास लगभग प्रत्येक तीन वर्षों में एक बार आता है और इसे अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इसी विशेष अधिक मास में आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को शास्त्रों में विशेष महत्व प्राप्त है, जिसे मुद्गल पुराण में “वरदा चतुर्थी” के रूप में वर्णित किया गया है।
वर्ष 2026 में यह दुर्लभ धार्मिक अवसर बुधवार, 20 मई को पड़ रहा है, जब अधिक मास शुक्ल चतुर्थी का संयोग बन रहा है। पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि का मध्याह्न मुहूर्त प्रातः 11:04 बजे से 11:06 बजे तक रहेगा, जिसकी अवधि लगभग तीन मिनट की मानी गई है। इससे एक दिन पूर्व वर्जित चन्द्रदर्शन का समय 19 मई को दोपहर 2:18 बजे से रात 9:26 बजे तक निर्धारित किया गया है, जिसकी अवधि लगभग 7 घंटे 8 मिनट होगी। वहीं चतुर्थी तिथि से संबंधित अन्य वर्जित चन्द्रदर्शन का समय 20 मई को प्रातः 9:31 बजे से रात 10:26 बजे तक रहेगा, जिसकी कुल अवधि लगभग 12 घंटे 55 मिनट बताई गई है। पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि का प्रारम्भ 19 मई 2026 को दोपहर 2:18 बजे होगा और इसका समापन 20 मई 2026 को प्रातः 11:06 बजे के साथ होगा।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार अधिक मास की शुक्ल चतुर्थी पर किया जाने वाला व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है। शास्त्रों में वर्णित विधि के अनुसार व्रती प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ एवं शुद्ध वस्त्र धारण करता है और व्रत का संकल्प लेता है। इसके बाद घर के देवस्थान या गणेश मंदिर में लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति अथवा चित्र की स्थापना की जाती है। पूजन में आवाहन, आसन, अर्घ्य, पाद्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, दक्षिणा एवं आरती सहित षोडशोपचार विधि का पालन किया जाता है।
इस पूजा में भगवान गणेश को लाल पुष्प और सिन्दूर अर्पित करना विशेष रूप से शुभ माना गया है। साथ ही दूर्वा, शुद्ध घी, मोदक और लड्डू का भोग अर्पित करने की परंपरा भी बताई गई है। दिनभर उपवास रखने के बाद सायंकाल अधिक मास शुक्ल चतुर्थी व्रत कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है। मुद्गल पुराण के अनुसार इस व्रत का पारण पञ्चमी तिथि को ब्राह्मणों के समक्ष विधिवत रूप से करने का विधान है।
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित यह व्रत केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, संयम और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि वरदा चतुर्थी का व्रत साधक को आत्मबल, मनोबल और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है तथा जीवन से जुड़े विभिन्न संकटों के निवारण में सहायक होता है। अधिक मास की इस विशेष तिथि पर श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया पूजन भक्तों के जीवन में शांति, समृद्धि और संतुलन स्थापित करने वाला माना गया है, जिससे यह अवसर धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
