भारत के दूरस्थ समुद्री छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। अंडमान एवं निकोबार प्रशासन द्वारा ग्रेट निकोबार आइलैंड डेवलपमेंट एरिया को आधिकारिक रूप से अधिसूचित किए जाने के बाद इस महत्वाकांक्षी परियोजना ने निर्णायक चरण में प्रवेश कर लिया है। यह अधिसूचना द्वीप के समग्र विकास के लिए एक औपचारिक मास्टर प्लान तैयार करने का रास्ता खोलती है, जिसमें बंदरगाह, हवाई अड्डा, औद्योगिक क्षेत्र और शहरी ढांचे के निर्माण की रूपरेखा शामिल है।

परियोजना के तहत दूसरे एयरफील्ड के निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने और हवाई अड्डे के विकास से जुड़े तकनीकी पहलुओं के विस्तार ने संकेत दिया है कि सरकार इसे रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। प्रस्तावित हवाई अड्डा दोहरे उपयोग वाला होगा, जो नागरिक उड्डयन के साथ-साथ रक्षा आवश्यकताओं को भी पूरा करेगा। माना जा रहा है कि यह ढांचा हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री और हवाई निगरानी क्षमता को मजबूत करेगा।

हालांकि, इस विकास यात्रा के समानांतर कानूनी, नियामक और संस्थागत चुनौतियां भी उभरकर सामने आ रही हैं। परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय अनुमोदनों और प्रक्रिया की वैधता को लेकर न्यायिक मंचों पर सुनवाई जारी है। साथ ही, आदिवासी अधिकारों, भूमि उपयोग और वन संरक्षण कानूनों के अनुपालन को लेकर संबंधित संवैधानिक संस्थाओं ने भी सवाल उठाए हैं। इन पहलुओं पर सरकार का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार पूरी की जा रही हैं और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष सावधानियां बरती जाएंगी।

इसी बीच, देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित अरावली पर्वतमाला में हो रहे कथित विनाश ने पर्यावरणीय चिंताओं को और गहरा कर दिया है। खनन, अवैध निर्माण और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण अरावली की जैव विविधता, जल संरक्षण क्षमता और पारिस्थितिक संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली न केवल उत्तर भारत के लिए प्राकृतिक ढाल है, बल्कि भूजल पुनर्भरण और जलवायु संतुलन में भी इसकी अहम भूमिका है।

ग्रेट निकोबार परियोजना और अरावली क्षेत्र में हो रही गतिविधियों को लेकर उठ रही चिंताओं का साझा सूत्र पर्यावरण पर संभावित खतरा है। ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित निर्माण से घने वर्षावनों, समुद्री जैव विविधता और दुर्लभ प्रजातियों के आवास पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। वहीं अरावली में जारी गतिविधियां शहरी बाढ़, तापमान वृद्धि और जल संकट जैसी समस्याओं को जन्म दे सकती हैं।

सरकारी एजेंसियां दोनों ही मामलों में यह दोहराती रही हैं कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, शमन उपाय और वैधानिक निगरानी तंत्र को मजबूत करने की बात कही जा रही है। इसके बावजूद, इन परियोजनाओं का पैमाना और उनकी दीर्घकालिक परिणति नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और समाज के लिए एक बड़ी परीक्षा बनती जा रही है।

ग्रेट निकोबार से लेकर अरावली तक, भारत की विकास गाथा एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां आर्थिक प्रगति, रणनीतिक जरूरतें और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन तय करना आने वाले वर्षों की दिशा निर्धारित करेगा। यह बहस केवल आज की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी गहराई से जुड़ी हुई है।

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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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