देश की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक अरावली को लेकर हाल के दिनों में एक नया कानूनी और पर्यावरणीय विवाद सामने आया है। “100 मीटर नियम” के नाम से चर्चित यह मामला तब सुर्खियों में आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा सुझाई गई अरावली पहाड़ियों की एक नई, समान परिभाषा को स्वीकार कर लिया। इस फैसले के बाद न सिर्फ पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों में चिंता बढ़ी, बल्कि राजनीतिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के एक विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट के आधार पर अरावली पहाड़ियों और अरावली रेंज की नई परिभाषा को मान्यता दी। इस नई परिभाषा के अनुसार, किसी भू-आकृति को अरावली की पहाड़ी तभी माना जाएगा, जब उसकी ऊंचाई आसपास की स्थानीय भूमि से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। इसे तकनीकी भाषा में “लोकल रिलीफ” कहा गया है। इसके साथ ही “अरावली रेंज” को परिभाषित करते हुए कहा गया कि 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित दो या उससे अधिक ऐसी पहाड़ियां एक अरावली रेंज मानी जाएंगी।

सरकार का तर्क है कि यह परिभाषा वैज्ञानिक और मानकीकृत है, जिससे वर्षों से चली आ रही अस्पष्टता को समाप्त किया जा सके। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में अरावली की भौगोलिक पहचान को लेकर भिन्न-भिन्न मानक अपनाए जा रहे थे, जिससे कानूनी विवाद और प्रशासनिक समस्याएं पैदा हो रही थीं। 100 मीटर का यह मानक देशभर में एक समान ढांचा प्रदान करता है, जिससे संरक्षण और नियमन के फैसले अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक हो सकेंगे।

केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर उठ रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए साफ किया है कि इस नई परिभाषा का उद्देश्य अरावली क्षेत्र में खनन को बढ़ावा देना नहीं है। सरकार का कहना है कि खनन पर पहले से लागू प्रतिबंधों में कोई ढील नहीं दी गई है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत टिकाऊ और वैज्ञानिक खनन नीति तैयार होने तक नए खनन कार्यों पर रोक जारी रहेगी। अधिकारियों के मुताबिक, नई परिभाषा के बावजूद अरावली क्षेत्र का बड़ा हिस्सा अब भी पर्यावरणीय सुरक्षा के दायरे में रहेगा।

हालांकि, इस फैसले ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक असंतोष को जन्म दिया है। पर्यावरणविदों का मानना है कि अरावली की कई छोटी और कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां, जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, इस परिभाषा से बाहर हो सकती हैं। उनका तर्क है कि ये पहाड़ियां भूजल रिचार्ज, जैव विविधता संरक्षण और रेगिस्तान के फैलाव को रोकने में अहम भूमिका निभाती हैं, भले ही उनकी ऊंचाई 100 मीटर से कम हो।

विपक्षी नेताओं ने भी सरकार पर आरोप लगाए हैं कि यह परिभाषा अरावली के बड़े हिस्से को कानूनी संरक्षण से वंचित कर सकती है। कुछ राज्यों में इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन और जन आंदोलन भी देखने को मिले हैं, जहां स्थानीय समुदायों ने अरावली को “प्राकृतिक ढाल” बताते हुए इसके संरक्षण की मांग की है।

अरावली पर 100 मीटर नियम का यह मामला केवल एक तकनीकी परिभाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की एक बड़ी बहस को सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृति के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस नई परिभाषा का जमीनी स्तर पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्या यह अरावली की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएगी या नहीं।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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