ग्रिडलॉक से ग्रोथ तक: कैसे 50 बैठकों ने बदल दिया भारत का नक्शा? ऑक्सफोर्ड की रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की हालिया केस स्टडी में भारत के PRAGATI प्लेटफॉर्म की वैश्विक सराहना हुई है। जानें कैसे इस 'ग्रिडलॉक से ग्रोथ' मॉडल ने NH-48 जैसी दशकों से अटकी परियोजनाओं को नई रफ्तार दी और कैसे प्रधानमंत्री की सीधी निगरानी में भारत का डिजिटल गवर्नेंस तंत्र पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया है।

India's PRAGATI Module : वैश्विक शिक्षा के शिखर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने भारत की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर एक ऐसा खुलासा किया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। ऑक्सफोर्ड के प्रतिष्ठित 'सईद बिजनेस स्कूल' द्वारा हाल ही में जारी एक विस्तृत केस स्टडी में भारत के 'PRAGATI' (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इंप्लीमेंटेशन) प्लेटफॉर्म की जमकर सराहना की गई है। रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया है कि कैसे एक डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भारत के जटिल सरकारी तंत्र के भीतर दशकों से जमी धूल और प्रशासनिक गतिरोध यानी 'ग्रिडलॉक' को विकास की 'ग्रोथ' में तब्दील कर दिया है। गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से तैयार की गई यह स्टडी बताती है कि प्रधानमंत्री की सीधी निगरानी वाले इस तंत्र ने उन परियोजनाओं में जान फूंक दी है, जिन्हें सिस्टम ने लगभग मृत मान लिया था।
इस केस स्टडी का सबसे रोमांचक हिस्सा राष्ट्रीय राजमार्ग-48 (पूर्व में NH-8) के दहिसर–सूरत खंड की कहानी है, जो भारतीय नौकरशाही की सुस्ती और फिर 'प्रगति' से मिली स्फूर्ति का जीता-जागता प्रमाण है। साल 2008 में शुरू हुई इस 239 किलोमीटर लंबी सड़क परियोजना को 2011 तक पूरा हो जाना था, लेकिन पर्यावरण और भूमि अधिग्रहण के पेचों में उलझकर यह सालों तक अधर में लटकी रही। विशेष रूप से मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान से गुजरने वाला महज 1.5 किलोमीटर का हिस्सा पूरे देश के बुनियादी ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड द्वारा अनुमति खारिज किए जाने के बाद केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एक ऐसा गतिरोध पैदा हुआ जिसे सुलझाना नामुमकिन सा लग रहा था।
साल 2017 में इस अटकी हुई फाइल की किस्मत तब बदली जब इसे PRAGATI प्लेटफॉर्म के तहत सीधे प्रधानमंत्री की समीक्षा के दायरे में लाया गया। ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं ने गहराई से विश्लेषण किया कि कैसे इस प्लेटफॉर्म ने सभी हितधारकों को एक मेज पर लाकर संवाद की नई राह खोली। PRAGATI के हस्तक्षेप के बाद ही राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने महाराष्ट्र राज्य वन्यजीव बोर्ड को अंतिम निर्णय लेने की शक्तियां सौंपीं। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले इस बोर्ड ने वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए 'साउंड बैरियर' और विशेष सुरक्षात्मक सीमाएं लगाने जैसी शर्तों के साथ परियोजना को हरी झंडी दे दी। जो मामला वर्षों से अदालतों और फाइलों के चक्कर काट रहा था, वह आपसी समन्वय और तकनीक के तालमेल से सुलझ गया।
ऑक्सफोर्ड की यह रिपोर्ट निष्कर्ष निकालती है कि 'प्रगति' सिर्फ एक सॉफ्टवेयर या पोर्टल नहीं है, बल्कि यह नेतृत्व आधारित निगरानी का एक ऐसा मॉडल है जो पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच एक दुर्लभ संतुलन स्थापित करता है। अध्ययन के अनुसार, जब देश का शीर्ष नेतृत्व स्वयं परियोजनाओं की बाधाओं को दूर करने के लिए राज्यों और विभागों के साथ संवाद करता है, तो जवाबदेही बढ़ती है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आती है। आज यह मॉडल न केवल भारत के बुनियादी ढांचे को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर विकासशील देशों के लिए शासन और क्रियान्वयन का एक नया मानदंड भी स्थापित कर रहा है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
